नई दिल्ली। पेट्रोल में एथेनॉल मिश्रण (Ethanol Blending) बढ़ाने की अपनी महत्वाकांक्षी योजना पर केंद्र सरकार फिलहाल सावधानी बरतती दिखाई दे रही है। सूत्रों के हवाले से सामने आई जानकारी के अनुसार, सरकार E25 ब्लेंडिंग (75% पेट्रोल और 25% एथेनॉल) को जल्द लागू करने की योजना पर फिलहाल पुनर्विचार कर रही है। बताया जा रहा है कि आम उपभोक्ताओं, ऑटोमोबाइल उद्योग और तकनीकी विशेषज्ञों की चिंताओं को देखते हुए सरकार इस प्रक्रिया को चरणबद्ध तरीके से आगे बढ़ाना चाहती है।
E20 से E25 तक का सफर फिलहाल धीमा
भारत सरकार ने पहले वर्ष 2030 तक पूरे देश में E20 (20% एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल) लागू करने का लक्ष्य रखा था। बाद में इस लक्ष्य को समय से पहले हासिल करने का निर्णय लिया गया और देश के अधिकांश पेट्रोल पंपों पर E20 ईंधन उपलब्ध कराया गया।
हाल के महीनों में सरकार ने 22% से 30% एथेनॉल मिश्रित ईंधन पर उत्पाद शुल्क (Excise Duty) में राहत देने की घोषणा की, वहीं ब्यूरो ऑफ इंडियन स्टैंडर्ड्स (BIS) ने E25 के लिए नए मानक भी अधिसूचित किए। इससे संकेत मिले कि सरकार जल्द ही E25 लागू कर सकती है।
हालांकि, अब सामने आ रही रिपोर्टों के अनुसार, सरकार फिलहाल इस फैसले को टालने के पक्ष में दिखाई दे रही है ताकि उपभोक्ताओं और वाहन उद्योग को पर्याप्त समय मिल सके।
क्यों बढ़ रही हैं उपभोक्ताओं की चिंताएं?
E20 लागू होने के बाद कई वाहन मालिकों ने माइलेज में कमी और पुराने वाहनों के प्रदर्शन को लेकर चिंता जताई है। हालांकि सभी वाहनों पर इसका प्रभाव समान नहीं होता और यह वाहन की तकनीक तथा निर्माता की अनुशंसाओं पर निर्भर करता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, एथेनॉल की ऊर्जा क्षमता (Energy Density) पेट्रोल की तुलना में कम होती है। यही कारण है कि अधिक एथेनॉल मिश्रण वाले ईंधन के उपयोग से कुछ परिस्थितियों में माइलेज में कमी देखी जा सकती है।
इसके अलावा विशेषज्ञ निम्नलिखित चुनौतियों की ओर भी ध्यान दिलाते हैं—
– पुराने वाहनों में ईंधन प्रणाली के कुछ रबर, प्लास्टिक या धातु के पुर्जों पर लंबे समय में अतिरिक्त प्रभाव पड़ सकता है।
– एथेनॉल नमी (Moisture) को आकर्षित करता है, इसलिए लंबे समय तक वाहन खड़ा रहने की स्थिति में कुछ तकनीकी समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं।
– अत्यधिक ठंडे क्षेत्रों में अधिक एथेनॉल मिश्रित ईंधन के साथ स्टार्टिंग प्रदर्शन प्रभावित होने की आशंका जताई जाती है।
हालांकि इन प्रभावों की तीव्रता वाहन की डिजाइन, रखरखाव और निर्माता द्वारा निर्धारित ईंधन मानकों पर निर्भर करती है।
सरकार का पक्ष
सरकार का कहना है कि एथेनॉल मिश्रित ईंधन पर विभिन्न संस्थानों द्वारा परीक्षण किए गए हैं। ऑटोमोटिव रिसर्च एसोसिएशन ऑफ इंडिया (ARAI) की परीक्षण रिपोर्ट में दावा किया गया है कि E20 ईंधन का आधुनिक वाहनों के धातु के पुर्जों पर प्रभाव सीमित पाया गया है।
इसके साथ ही वाहन निर्माता कंपनियां भी लगातार E20 और उससे अधिक मिश्रण के अनुकूल इंजन विकसित कर रही हैं।
सरकार एथेनॉल ब्लेंडिंग क्यों बढ़ाना चाहती है?
सरकार के इस अभियान के पीछे कई बड़े आर्थिक और पर्यावरणीय कारण बताए जाते हैं।
1. कच्चे तेल के आयात में कमी
भारत अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं का बड़ा हिस्सा आयातित कच्चे तेल से पूरा करता है। एथेनॉल मिश्रण बढ़ने से विदेशी मुद्रा की बचत और आयात बिल कम करने में मदद मिल सकती है।
2. किसानों को लाभ
भारत में एथेनॉल का प्रमुख स्रोत गन्ना और अन्य कृषि उत्पाद हैं। इससे चीनी मिलों और गन्ना किसानों को अतिरिक्त बाजार मिलता है तथा अधिशेष उत्पादन के बेहतर उपयोग की संभावना बनती है।
3. पर्यावरणीय लाभ
एथेनॉल को अपेक्षाकृत स्वच्छ ईंधन माना जाता है, जिससे कार्बन उत्सर्जन कम करने में मदद मिल सकती है।
ब्राजील मॉडल से क्या सीख सकता है भारत?
एथेनॉल ब्लेंडिंग का सबसे चर्चित उदाहरण ब्राजील है। वहां दशकों से एथेनॉल आधारित ईंधन का व्यापक उपयोग हो रहा है।
हालांकि विशेषज्ञों के अनुसार भारत और ब्राजील के मॉडल में महत्वपूर्ण अंतर हैं।
ब्राजील में उपभोक्ताओं के पास सामान्य पेट्रोल और अधिक एथेनॉल मिश्रित ईंधन के बीच विकल्प उपलब्ध होता है। इसके अलावा एथेनॉल आधारित ईंधन की कीमत भी आमतौर पर पेट्रोल से कम रखी जाती है, जिससे माइलेज में संभावित कमी की भरपाई हो जाती है।
भारत में फिलहाल अधिकांश उपभोक्ताओं के पास ऐसा विकल्प उपलब्ध नहीं है और कीमतों में भी ऐसा स्पष्ट अंतर देखने को नहीं मिलता।
आगे क्या?
बताया जा रहा है कि ऑटोमोबाइल उद्योग ने सरकार से E25 लागू करने से पहले पर्याप्त तैयारी का समय देने का अनुरोध किया है। नई तकनीक के अनुरूप इंजन डिजाइन, परीक्षण और प्रमाणन (Homologation) की प्रक्रिया में समय लगता है।
ऐसे में संभावना जताई जा रही है कि सरकार E25 को तत्काल लागू करने के बजाय चरणबद्ध तरीके से आगे बढ़े।
फिलहाल यह स्पष्ट है कि एथेनॉल ब्लेंडिंग भारत की ऊर्जा नीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बनी रहेगी। लेकिन भविष्य की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि सरकार ऊर्जा सुरक्षा, किसानों के हित और उपभोक्ताओं की जेब—इन तीनों के बीच कितना संतुलन बना पाती है।












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