गुलशन कुमार हत्याकांड: क्या नदीम सैफी सचमुच मास्टरमाइंड थे, या मुंबई पुलिस की सबसे बड़ी जांच हुई थी नाकाम?

मुंबई | स्पेशल रिपोर्ट

12 अगस्त 1997 की सुबह मुंबई के अंधेरी स्थित एक छोटे से शिव मंदिर के बाहर चली गोलियों ने सिर्फ भारत के सबसे बड़े म्यूजिक कारोबारी गुलशन कुमार की जान नहीं ली, बल्कि बॉलीवुड, अंडरवर्ल्ड और कानून व्यवस्था के रिश्तों पर भी हमेशा के लिए सवाल खड़े कर दिए।

टी-सीरीज़ के संस्थापक गुलशन कुमार उस दौर में भारतीय म्यूजिक इंडस्ट्री का सबसे बड़ा नाम थे। दिल्ली में जूस की दुकान से शुरुआत करने वाला यह शख्स करोड़ों रुपये की म्यूजिक कंपनी का मालिक बन चुका था। लेकिन सफलता के शिखर पर खड़े इस कारोबारी की हत्या ने पूरे देश को झकझोर दिया।

हत्या के महज़ 20 दिन बाद मुंबई पुलिस ने एक सनसनीखेज दावा किया। तत्कालीन पुलिस कमिश्नर रॉनी मेंडोसा ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर कहा कि इस हत्या की साजिश मशहूर संगीतकार नदीम सैफी ने अंडरवर्ल्ड डॉन अबू सलीम के साथ मिलकर रची थी। पुलिस का आरोप था कि पेशेवर प्रतिद्वंद्विता और बढ़ते विवाद के चलते नदीम ने गुलशन कुमार को रास्ते से हटाने का फैसला किया।

लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई।

जब तक पुलिस ने नदीम को मुख्य आरोपी घोषित किया, वह लंदन पहुंच चुके थे। भारत सरकार ने उनके प्रत्यर्पण की कोशिश शुरू की, लेकिन लंदन की अदालत में मामला पूरी तरह पलट गया।

सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने मुंबई पुलिस की जांच पर गंभीर सवाल उठाए। दस्तावेजों में विरोधाभास, गवाहों के बदले हुए बयान, अनुवाद में कथित हेरफेर और जांच प्रक्रिया की खामियों ने भारतीय पक्ष को कमजोर कर दिया। अंततः ब्रिटिश अदालत ने नदीम सैफी के प्रत्यर्पण से इनकार कर दिया और कहा कि उपलब्ध सबूत उन्हें भारत भेजने के लिए पर्याप्त नहीं हैं।

इस फैसले ने मुंबई पुलिस की जांच पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सवाल खड़े कर दिए। बाद में ब्रिटेन में कानूनी लड़ाई का खर्च भी सरकार की ओर से वहन किया गया और नदीम सैफी को बड़ी कानूनी राहत मिली।

उधर, इस हत्याकांड में शामिल दो शूटरों को उम्रकैद की सजा मिली, लेकिन जिस अबू सलीम को पुलिस और बाद की अदालतों ने साजिश का अहम किरदार माना, उस पर इस मामले में मुकदमा ही नहीं चल सका। वजह थी पुर्तगाल से भारत प्रत्यर्पण के समय लगी कानूनी शर्तें, जिनके कारण गुलशन कुमार हत्याकांड उस सूची में शामिल नहीं था जिन मामलों में उस पर मुकदमा चलाया जा सकता था।

इस केस के दौरान कई और रहस्य सामने आए। एक अहम गवाह की मौत मुंबई पुलिस मुख्यालय के भीतर संदिग्ध परिस्थितियों में हो गई, जबकि एक अन्य प्रमुख गवाह रहस्यमय तरीके से लापता हो गया। इन घटनाओं ने जांच की विश्वसनीयता पर और भी प्रश्नचिह्न लगा दिए।

करीब 24 वर्षों तक चली कानूनी प्रक्रिया के बाद भी यह मामला पूरी तरह अपने तार्किक निष्कर्ष तक नहीं पहुंच सका। अदालत ने शूटरों को दोषी माना, लेकिन कथित साजिशकर्ताओं को कानून के दायरे में सजा नहीं मिल सकी।

आज टी-सीरीज़ दुनिया की सबसे बड़ी म्यूजिक कंपनियों में शामिल है और भूषण कुमार इसके कारोबार को आगे बढ़ा रहे हैं। वहीं नदीम सैफी विदेश में रह रहे हैं और भारत नहीं लौटे हैं। अबू सलीम भारतीय जेल में बंद है, लेकिन गुलशन कुमार हत्याकांड में वह कभी कटघरे तक नहीं पहुंच पाया।

गुलशन कुमार हत्याकांड आज भी भारतीय न्याय व्यवस्था, पुलिस जांच और अंडरवर्ल्ड के प्रभाव पर सबसे चर्चित मामलों में गिना जाता है। यह सिर्फ एक हत्या नहीं थी, बल्कि 90 के दशक के उस दौर की कहानी थी, जब बॉलीवुड, अपराध और सत्ता के बीच की सीमाएं धुंधली पड़ चुकी थीं।

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