28 जून: भारत रत्न, पूर्व प्रधानमंत्री पी. वी. नरसिम्हा राव की जयंती पर विशेष
भारतीय राजनीति के इतिहास में कुछ नेता ऐसे होते हैं, जिनका योगदान उनके भाषणों से नहीं, बल्कि उनके फैसलों से याद किया जाता है। ऐसे ही व्यक्तित्व थे भारत के नौवें प्रधानमंत्री पी. वी. नरसिम्हा राव। उन्हें अक्सर “मौन प्रधानमंत्री” कहा गया, लेकिन उनके शांत स्वभाव के पीछे एक दूरदर्शी राजनेता, कुशल प्रशासक और विद्वान चिंतक छिपा था, जिसने आधुनिक भारत की दिशा बदल दी।
28 जून 1921 को वर्तमान तेलंगाना के करीमनगर क्षेत्र में जन्मे पी. वी. नरसिम्हा राव भारतीय राजनीति के उन दुर्लभ नेताओं में शामिल थे, जिन्होंने संकट के समय देश की कमान संभाली। वर्ष 1991 में भारत गंभीर आर्थिक संकट से जूझ रहा था। विदेशी मुद्रा भंडार लगभग समाप्त हो चुका था और देश आर्थिक दिवालियेपन के कगार पर था। ऐसे कठिन समय में प्रधानमंत्री बने नरसिम्हा राव ने डॉ. मनमोहन सिंह को वित्त मंत्री बनाकर आर्थिक उदारीकरण की ऐतिहासिक शुरुआत की। यही वह निर्णय था जिसने भारतीय अर्थव्यवस्था को नई दिशा दी और भारत को वैश्विक बाजार में नई पहचान दिलाई।
बहुत कम लोग जानते हैं कि नरसिम्हा राव राजनीति से संन्यास लेने की तैयारी कर चुके थे। 1991 के आम चुनाव से पहले उन्होंने सार्वजनिक जीवन से दूरी बनाने का मन बना लिया था। लेकिन पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या के बाद बदले राजनीतिक घटनाक्रम ने उन्हें देश की सबसे बड़ी जिम्मेदारी तक पहुंचा दिया।
पी. वी. नरसिम्हा राव केवल राजनेता ही नहीं, बल्कि असाधारण विद्वान भी थे। वे तेलुगु, हिंदी, संस्कृत, मराठी, उर्दू, अंग्रेज़ी, तमिल और कन्नड़ सहित 10 से अधिक भाषाओं के ज्ञाता थे। साहित्य में उनकी गहरी रुचि थी और उन्होंने प्रसिद्ध तेलुगु उपन्यास ‘वेयी पदगलु’ का हिंदी अनुवाद ‘सहस्र फण’ नाम से किया, जिसे साहित्य जगत में भी सराहा गया।
विदेश नीति के क्षेत्र में भी उनका योगदान उल्लेखनीय रहा। उनकी सरकार ने “लुक ईस्ट पॉलिसी” की शुरुआत की, जिसने दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के साथ भारत के संबंधों को नई मजबूती दी। बाद के वर्षों में यही नीति भारत की विदेश नीति की आधारशिला बनी।
उनकी एक और बड़ी उपलब्धि यह रही कि उन्होंने अल्पमत सरकार का सफलतापूर्वक पाँच वर्ष का कार्यकाल पूरा किया। उस दौर में यह भारतीय राजनीति की सबसे बड़ी प्रशासनिक और राजनीतिक सफलताओं में गिना गया।
प्रधानमंत्री बनने से पहले उन्होंने विदेश, रक्षा, गृह और मानव संसाधन विकास जैसे कई महत्वपूर्ण मंत्रालयों की जिम्मेदारी भी संभाली थी। यही व्यापक प्रशासनिक अनुभव उनके नेतृत्व की सबसे बड़ी ताकत बना।
हालांकि, उनके निधन के बाद लंबे समय तक यह चर्चा होती रही कि उन्हें उनके योगदान के अनुरूप राजनीतिक सम्मान नहीं मिला। लेकिन समय के साथ इतिहास ने उनके कार्यों का निष्पक्ष मूल्यांकन किया। अंततः उन्हें मरणोपरांत भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ प्रदान किया गया, जिसने उनके ऐतिहासिक योगदान को औपचारिक मान्यता दी।
आज, उनकी जयंती पर उन्हें याद करना केवल एक पूर्व प्रधानमंत्री को श्रद्धांजलि देना नहीं, बल्कि उस दूरदर्शी नेतृत्व को सम्मान देना है जिसने कठिन परिस्थितियों में साहसिक निर्णय लेकर भारत को आर्थिक, राजनीतिक और वैश्विक स्तर पर नई पहचान दिलाई।
पी. वी. नरसिम्हा राव हमें यह सिखाते हैं कि इतिहास में सबसे ऊँची आवाज़ हमेशा वही नहीं होती जो सबसे ज़्यादा सुनाई दे, बल्कि कई बार वह होती है जो चुप रहकर भी आने वाली पीढ़ियों का भविष्य बदल देती है।












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