30 दिन जेल में रहने पर मंत्री, मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री को पद छोड़ना पड़ेगा? प्रस्तावित संविधान संशोधन पर सियासत तेज

नई दिल्ली। यदि केंद्र सरकार का प्रस्तावित संविधान संशोधन कानून का रूप लेता है, तो देश की राजनीति में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। प्रस्तावित व्यवस्था के अनुसार, यदि प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या कोई मंत्री ऐसे गंभीर आपराधिक मामले में लगातार 30 दिनों तक न्यायिक हिरासत में रहता है, जिसमें पांच वर्ष या उससे अधिक की सजा का प्रावधान हो, तो 31वें दिन उसका पद स्वतः समाप्त हो सकता है।
हालांकि यह प्रस्ताव अभी कानून नहीं है और इसके लागू होने से पहले संसद के दोनों सदनों में आवश्यक बहुमत तथा अन्य संवैधानिक प्रक्रियाओं से गुजरना होगा।

आखिर प्रस्ताव में क्या है?
प्रस्तावित संशोधन का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना बताया जा रहा है कि गंभीर आपराधिक मामलों में लंबे समय तक हिरासत में रहने वाले जनप्रतिनिधि संवैधानिक पदों पर बने न रहें। सरकार का तर्क है कि इससे शासन व्यवस्था में जवाबदेही और नैतिक मानकों को मजबूती मिलेगी।
यदि यह व्यवस्था लागू होती है, तो प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, केंद्रीय मंत्री और राज्य मंत्रियों सहित सभी संवैधानिक कार्यपालिका पद इसके दायरे में आ सकते हैं।

विपक्ष क्यों कर रहा है विरोध?
विपक्ष का कहना है कि यह प्रस्ताव भारतीय न्याय व्यवस्था के मूल सिद्धांत “जब तक दोष सिद्ध न हो, तब तक व्यक्ति निर्दोष है” के विरुद्ध है।
विपक्षी दलों का आरोप है कि यदि केवल हिरासत के आधार पर किसी निर्वाचित मुख्यमंत्री या मंत्री को पद छोड़ना पड़े, तो जांच एजेंसियों के माध्यम से राजनीतिक सरकारों को अस्थिर करने की आशंका बढ़ सकती है।
उनका तर्क है कि हिरासत और दोषसिद्धि दो अलग-अलग कानूनी अवस्थाएं हैं। कई मामलों में वर्षों बाद अदालतें आरोपियों को बरी भी कर देती हैं।
केजरीवाल और हेमंत सोरेन का उदाहरण
इस बहस के केंद्र में हाल के वर्षों की दो प्रमुख घटनाएं भी हैं।
दिल्ली के तत्कालीन मुख्यमंत्री Arvind Kejriwal कई महीनों तक जेल में रहने के बावजूद अपने पद पर बने रहे थे, जबकि Hemant Soren ने गिरफ्तारी से पहले मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था।
इन्हीं घटनाओं के बाद इस प्रकार के कानूनी प्रावधान की आवश्यकता पर राजनीतिक बहस तेज हुई।
संयुक्त संसदीय समिति की भूमिका
प्रस्तावित संशोधन पर व्यापक विरोध के बाद इसे संयुक्त संसदीय समिति (JPC) के पास भेजा गया। समिति का उद्देश्य विभिन्न पक्षों की राय लेना और विधेयक के कानूनी एवं संवैधानिक पहलुओं की समीक्षा करना है।
सूत्रों के अनुसार समिति अपनी रिपोर्ट संसद के आगामी सत्र में प्रस्तुत कर सकती है। हालांकि अंतिम निर्णय संसद की कार्यवाही और मतदान पर निर्भर करेगा।
सरकार की चुनौती
संविधान संशोधन पारित कराने के लिए संसद के दोनों सदनों में विशेष बहुमत आवश्यक होता है। इसलिए सरकार को केवल अपने सहयोगियों का समर्थन ही नहीं, बल्कि पर्याप्त संख्या भी जुटानी होगी।
यही कारण है कि इस प्रस्ताव को केवल कानूनी नहीं बल्कि राजनीतिक दृष्टि से भी बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
आगे क्या?
यदि यह संशोधन पारित होता है, तो भारतीय राजनीति में संवैधानिक पदों की जवाबदेही से जुड़े नियमों में ऐतिहासिक बदलाव आ सकता है। वहीं यदि विपक्ष अपने विरोध पर कायम रहता है, तो यह विधेयक संसद में तीखी बहस और राजनीतिक टकराव का कारण बन सकता है।
फिलहाल सभी निगाहें संसद के आगामी सत्र और संयुक्त संसदीय समिति की रिपोर्ट पर टिकी हैं। वहीं यह बहस भी जारी है कि लोकतंत्र में नैतिक जवाबदेही और “दोष सिद्ध होने तक निर्दोष” के संवैधानिक सिद्धांत के बीच संतुलन किस प्रकार बनाया जाए।

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