अयोध्या। राम मंदिर में चढ़ावे और बहुमूल्य दान-सामग्री के प्रबंधन को लेकर उठे विवाद के बीच राम मंदिर ट्रस्ट में बड़ा प्रशासनिक बदलाव देखने को मिला है। ट्रस्ट के वरिष्ठ पदाधिकारियों चंपत राय और डॉ. अनिल मिश्रा के इस्तीफे स्वीकार किए जाने के बाद ट्रस्ट ने नई व्यवस्था लागू करने और पारदर्शिता बढ़ाने का भरोसा दिया है। हालांकि, पूरे घटनाक्रम के बाद कई सवाल अब भी अनुत्तरित हैं, जिन पर चर्चा जारी है।
ट्रस्ट की बैठक के बाद आयोजित मीडिया ब्रीफिंग में अंतरिम महासचिव कृष्ण मोहन और कोषाध्यक्ष महंत गोविंद गिरी ने कहा कि राम भक्तों की भावनाएं आहत हुई हैं और प्रबंधन में रही कमियों का कुछ लोगों ने फायदा उठाया। उन्होंने आश्वासन दिया कि भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए सभी प्रक्रियाओं को और मजबूत बनाया जाएगा।
मीडिया ब्रीफिंग के दौरान ट्रस्ट ने दावा किया कि जिन बहुमूल्य वस्तुओं को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं, उनमें से कुछ वस्तुएं—जैसे चरण पादुका, स्वर्ण जड़ित रामचरितमानस और अन्य कीमती चढ़ावे—मौजूद हैं। ट्रस्ट के अनुसार कुल 28 बहुमूल्य वस्तुएं सुरक्षित हैं और अधिकृत व्यक्ति चाहें तो उनका निरीक्षण कर सकते हैं।
हालांकि, विपक्ष और कई सामाजिक संगठनों का सवाल है कि यदि ये सभी वस्तुएं सुरक्षित थीं, तो विवाद उठने के शुरुआती दिनों में ही यह जानकारी सार्वजनिक क्यों नहीं की गई। दानदाताओं द्वारा रसीद न मिलने, चांदी की ईंटों और अन्य बहुमूल्य चढ़ावे के रिकॉर्ड को लेकर लगाए गए आरोपों का तत्काल स्पष्ट जवाब क्यों नहीं दिया गया, यह भी चर्चा का विषय बना हुआ है।
ट्रस्ट की ओर से यह भी कहा गया कि मीडिया के एक वर्ग और कुछ राजनीतिक दलों द्वारा तथ्यों को तोड़-मरोड़कर प्रस्तुत किया गया, जिससे राम भक्तों में भ्रम की स्थिति बनी। ट्रस्ट ने मीडिया से अपील की कि केवल सत्यापित तथ्यों को ही प्रकाशित और प्रसारित किया जाए।
प्रेस ब्रीफिंग में यह भी जानकारी दी गई कि ट्रस्ट के प्रशासनिक ढांचे को और मजबूत करने के लिए एक विशेष अधिकारी या मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) की नियुक्ति पर विचार किया जा रहा है। इसके लिए एक छोटी समिति का गठन किया गया है, जो आवश्यक सुझाव देगी।
हालांकि, इस पूरे घटनाक्रम में एक महत्वपूर्ण बात यह रही कि मीडिया ब्रीफिंग के दौरान पत्रकारों के सवाल नहीं लिए गए। केवल आधिकारिक बयान जारी कर कार्यक्रम समाप्त कर दिया गया। इससे कई ऐसे सवाल अब भी बने हुए हैं, जिनका सार्वजनिक उत्तर सामने नहीं आ सका।
इन सवालों में प्रमुख हैं—
– कथित चोरी या अनियमितता की जानकारी मिलने के बाद एफआईआर दर्ज करने में देरी क्यों हुई?
– दानदाताओं की शिकायतों का तत्काल समाधान क्यों नहीं किया गया?
– बहुमूल्य चढ़ावे का पूरा रिकॉर्ड और लेखा-जोखा सार्वजनिक करने की व्यवस्था कब बनेगी?
– क्या भविष्य में ट्रस्ट के कामकाज को अधिक पारदर्शी बनाने के लिए कोई स्वतंत्र निगरानी तंत्र बनाया जाएगा?
ट्रस्ट ने स्पष्ट किया है कि दोषी पाए जाने वाले किसी भी व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी और भविष्य में सभी प्रक्रियाओं को अधिक पारदर्शी तथा जवाबदेह बनाया जाएगा।
फिलहाल, दो प्रमुख इस्तीफों के बावजूद विवाद पूरी तरह शांत होता नहीं दिख रहा है। राम भक्तों, दानदाताओं और आम जनता की नजर अब इस बात पर है कि जांच के निष्कर्ष क्या सामने आते हैं और ट्रस्ट पारदर्शिता के अपने वादों को किस तरह लागू करता है।












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