समय साक्षी: नेहरू मंत्रिमंडल से इस्तीफा देकर जनसंघ की स्थापना तक – डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की राजनीतिक यात्रा

भारत के राजनीतिक इतिहास में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का नाम एक ऐसे नेता के रूप में दर्ज है, जिन्होंने सत्ता से अधिक अपने सिद्धांतों को महत्व दिया। स्वतंत्र भारत के पहले उद्योग एवं आपूर्ति मंत्री के रूप में उन्होंने देश के औद्योगिक विकास की मजबूत नींव रखी, लेकिन वैचारिक मतभेदों के कारण उन्होंने प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के मंत्रिमंडल से इस्तीफा देकर एक नई राजनीतिक धारा की शुरुआत की। यही धारा आगे चलकर भारतीय जनसंघ और फिर भारतीय जनता पार्टी की वैचारिक आधारशिला बनी।

स्वतंत्रता के बाद जब पंडित जवाहरलाल नेहरू ने देश का पहला मंत्रिमंडल बनाया, तो उसमें विभिन्न विचारधाराओं के नेताओं को स्थान दिया गया। हिंदू महासभा के प्रमुख नेता डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी को भी उद्योग एवं आपूर्ति मंत्रालय सौंपा गया। इतिहासकारों के अनुसार, उनके नाम का प्रस्ताव स्वयं सरदार वल्लभभाई पटेल ने रखा था। बंगाल विभाजन के प्रश्न पर मुखर्जी के रुख और उनकी प्रशासनिक क्षमता ने उन्हें इस पद तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

हालांकि डॉ. मुखर्जी की व्यक्तिगत रुचि शिक्षा के क्षेत्र में थी। मात्र 33 वर्ष की आयु में वे University of Calcutta के सबसे युवा कुलपति बने थे। लेकिन मंत्री के रूप में भी उन्होंने उल्लेखनीय कार्य किए। उनके कार्यकाल में Hindustan Aeronautics Limited के विकास को गति मिली, Chittaranjan Locomotive Works और सिंदरी उर्वरक संयंत्र जैसी औद्योगिक परियोजनाओं की शुरुआत हुई, वहीं Hirakud Dam परियोजना को भी आगे बढ़ाया गया।

मंत्रिमंडल में रहते हुए भी डॉ. मुखर्जी और प्रधानमंत्री नेहरू के बीच कई राष्ट्रीय मुद्दों पर मतभेद लगातार गहराते रहे। विभाजन के बाद शरणार्थियों की स्थिति, कश्मीर का प्रश्न और पूर्वी पाकिस्तान में हिंदुओं की सुरक्षा जैसे विषय दोनों नेताओं के बीच विवाद का कारण बने।

स्थिति तब निर्णायक मोड़ पर पहुंची जब भारत और पाकिस्तान के बीच अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के लिए Nehru–Liaquat Pact पर हस्ताक्षर हुए। डॉ. मुखर्जी का मानना था कि पाकिस्तान के आश्वासनों पर भरोसा नहीं किया जा सकता। इस समझौते से असहमति जताते हुए उन्होंने 1 अप्रैल 1950 को नेहरू मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया।

इस्तीफे के बाद डॉ. मुखर्जी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तत्कालीन सरसंघचालक M. S. Golwalkar से विचार-विमर्श किया और एक नई राजनीतिक पार्टी बनाने का निर्णय लिया। कई नामों पर चर्चा के बाद 21 अक्टूबर 1951 को दिल्ली में भारतीय जनसंघ की स्थापना हुई और डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी सर्वसम्मति से इसके पहले अध्यक्ष चुने गए। आरएसएस ने भी अपने कई प्रमुख प्रचारकों—जिनमें Deendayal Upadhyaya, Nanaji Deshmukh और Sundar Singh Bhandari शामिल थे—को संगठन निर्माण में सहयोग के लिए भेजा।

1952 के पहले आम चुनाव में जनसंघ को केवल तीन लोकसभा सीटें मिलीं, लेकिन डॉ. मुखर्जी स्वयं कोलकाता से सांसद चुने गए। संसद में उनके प्रभावशाली भाषणों और संसदीय ज्ञान के कारण उन्हें विपक्ष के सबसे प्रभावशाली नेताओं में गिना जाने लगा। कश्मीर मुद्दे पर उनका दिया गया नारा—”एक देश में दो विधान, दो निशान और दो प्रधान नहीं चलेंगे”—आगे चलकर भारतीय राजनीति का एक ऐतिहासिक नारा बन गया।

1953 में जम्मू-कश्मीर में लागू परमिट व्यवस्था का विरोध करते हुए डॉ. मुखर्जी ने बिना परमिट राज्य में प्रवेश करने का निर्णय लिया। 11 मई 1953 को उन्हें जम्मू-कश्मीर सीमा पर गिरफ्तार कर श्रीनगर में नजरबंद कर दिया गया। नजरबंदी के दौरान उनकी तबीयत लगातार बिगड़ती गई। गंभीर बीमारी के बाद उन्हें अस्पताल ले जाया गया, जहां 23 जून 1953 को मात्र 52 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया।

उनकी मृत्यु आज भी भारतीय राजनीति के सबसे चर्चित और विवादित अध्यायों में गिनी जाती है। कोलकाता में उनके अंतिम दर्शन के लिए लाखों लोग उमड़े। उनके निधन पर राजनीतिक मतभेदों के बावजूद प्रधानमंत्री Jawaharlal Nehru ने शोक व्यक्त करते हुए कहा कि विचारों में भिन्नता होने के बावजूद वे डॉ. मुखर्जी का सम्मान करते थे।

डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का जीवन भारतीय लोकतंत्र में वैचारिक संघर्ष, राष्ट्रवाद और लोकतांत्रिक राजनीति का एक महत्वपूर्ण अध्याय माना जाता है। नेहरू मंत्रिमंडल से उनका इस्तीफा केवल एक राजनीतिक निर्णय नहीं था, बल्कि भारतीय राजनीति में एक वैकल्पिक राष्ट्रीय विचारधारा के उदय की शुरुआत भी साबित हुआ।

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