मुंबई: क्या किसी सरकार का विरोध करने, उसके खिलाफ नारे लगाने या शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने की सजा किसी नागरिक को अपने ही शहर से बाहर निकाल देना हो सकती है? इस महत्वपूर्ण सवाल पर बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक ऐतिहासिक टिप्पणी करते हुए साफ कर दिया कि लोकतंत्र में असहमति जताना अपराध नहीं, बल्कि संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकार है।
बॉम्बे हाईकोर्ट ने सैयद अहमद अब्दुल वाहिद चौधरी बनाम महाराष्ट्र राज्य मामले की सुनवाई के दौरान मुंबई पुलिस के उस तड़ीपार आदेश को रद्द कर दिया, जिसके तहत एसडीपीआई (सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया) के जनरल सेक्रेटरी सैयद अहमद अब्दुल वाहिद चौधरी को एक वर्ष के लिए मुंबई और आसपास के जिलों से बाहर रहने का आदेश दिया गया था।
विरोध प्रदर्शन को बनाया आधार
मुंबई पुलिस ने अपने आदेश में कहा था कि वर्ष 2019 से 2024 के बीच चौधरी के खिलाफ कई एफआईआर दर्ज हुई थीं। इन मामलों का संबंध सीएए-एनआरसी, बाबरी मस्जिद, ज्ञानवापी और अन्य मुद्दों पर आयोजित विरोध प्रदर्शनों और रैलियों से था। पुलिस का दावा था कि बिना अनुमति प्रदर्शन आयोजित किए गए और कानून-व्यवस्था प्रभावित होने की आशंका थी।
हालांकि, याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकीलों ने अदालत को बताया कि अधिकांश एफआईआर भारतीय दंड संहिता की धारा 188 (सरकारी आदेश की अवहेलना) से जुड़ी थीं, जिसमें अधिकतम एक महीने की सजा का प्रावधान है। ऐसे मामलों के आधार पर किसी नागरिक को तड़ीपार करना कानून की भावना के विपरीत है।
हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी
मामले की सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति माधव जामदार ने मुंबई पुलिस की कार्रवाई पर गंभीर सवाल उठाए। अदालत ने कहा कि किसी नागरिक द्वारा सरकार या उसके नेताओं के खिलाफ नारे लगाना अपने आप में अपराध नहीं है।
कोर्ट ने टिप्पणी की कि “नागरिकों को अपनी राय रखने और सरकार का विरोध करने का संवैधानिक अधिकार प्राप्त है। यदि किसी व्यक्ति ने केवल सरकार के खिलाफ नारे लगाए हैं, तो इसके आधार पर उसे तड़ीपार नहीं किया जा सकता।”
अदालत ने यह भी कहा कि पुलिस जनता की सेवक है, न कि मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री या किसी राजनीतिक दल की गुलाम। यदि पुलिस सत्ता के विरोध को ही अपराध मानने लगे, तो यह लोकतंत्र और संविधान दोनों के लिए गंभीर खतरा होगा।
मौलिक अधिकारों की रक्षा पर जोर
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19 प्रत्येक नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण विरोध का अधिकार देता है, जबकि अनुच्छेद 21 सम्मानपूर्वक जीवन जीने की गारंटी प्रदान करता है। किसी व्यक्ति को उसके घर, परिवार और शहर से दूर करना एक असाधारण और कठोर प्रशासनिक कदम है, जिसे केवल तभी अपनाया जा सकता है जब उसके कारण समाज या लोगों की जान-माल को वास्तविक खतरा हो।
अदालत ने पाया कि पुलिस ऐसा कोई ठोस साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर सकी, जिससे यह साबित हो कि सैयद चौधरी की गतिविधियों से समाज या सार्वजनिक संपत्ति को कोई गंभीर खतरा था।
राजनीतिक तंज भी चर्चा में
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति जामदार की एक टिप्पणी भी चर्चा का विषय बनी। उन्होंने हल्के-फुल्के अंदाज में कहा कि आजकल “वॉशिंग मशीन” के जरिए पार्टी बदलने पर कई लोगों के खिलाफ दर्ज मामलों का असर खत्म हो जाता है। अदालत की यह टिप्पणी देश की वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों पर व्यंग्य के रूप में देखी जा रही है।
लोकतंत्र के लिए अहम संदेश
अपने फैसले में बॉम्बे हाईकोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि सरकार से असहमति रखना, सवाल पूछना और शांतिपूर्ण विरोध करना लोकतंत्र की आत्मा है। केवल विरोध प्रदर्शन या सरकार विरोधी नारे लगाने के आधार पर किसी नागरिक को अपराधी नहीं माना जा सकता और न ही उसे अपने शहर से बाहर करने जैसी कठोर कार्रवाई की जा सकती है।
यह फैसला न केवल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा करता है, बल्कि यह भी याद दिलाता है कि कानून का उद्देश्य नागरिकों की आवाज दबाना नहीं, बल्कि उनके संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करना है। लोकतंत्र में सत्ता से असहमति अपराध नहीं, बल्कि एक जागरूक नागरिक की पहचान है।












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