नई दिल्ली। देश में एक बार फिर भ्रष्टाचार को लेकर सार्वजनिक बहस तेज होती दिखाई दे रही है। परीक्षा पेपर लीक, घटिया निर्माण कार्य, सरकारी ठेकों में अनियमितताओं, पर्यावरण मंजूरियों में कथित गड़बड़ियों, मंदिरों में चोरी, निजी कंपनियों पर कब्जे और सरकारी पदों के दुरुपयोग जैसे मामलों ने भ्रष्टाचार को फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया है।
इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित अपने लेख “When Corruption Does Not Make a Political Noise” में राजनीतिक विश्लेषक प्रताप भानु मेहता ने कहा है कि असली सवाल यह नहीं है कि हर आरोप अदालत में साबित होगा या नहीं, बल्कि यह है कि समाज में यह धारणा तेजी से मजबूत हो रही है कि व्यवस्था के भीतर भ्रष्टाचार गहराई तक फैल चुका है।
मेहता के अनुसार, एक समय ऐसा था जब भ्रष्टाचार आम लोगों की राजनीतिक चेतना से कुछ हद तक ओझल हो गया था। इसकी चार प्रमुख वजहें थीं—भ्रष्टाचार का स्वरूप बदलकर बड़े ठेकों और प्राकृतिक संसाधनों तक सीमित दिखाई देना, सरकारी सेवाओं में सुधार और डिजिटलीकरण, भाजपा-आरएसएस की स्वयं को सुधारवादी शक्ति के रूप में प्रस्तुत करना तथा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की व्यक्तिगत ईमानदार छवि।
लेख में कहा गया है कि अब ये सभी आधार कमजोर पड़ते दिखाई दे रहे हैं। पेपर लीक, खराब होती सार्वजनिक सेवाएं, सड़कों की गुणवत्ता पर सवाल और शैक्षणिक संस्थानों तक में भ्रष्टाचार की चर्चाओं ने छोटे और बड़े भ्रष्टाचार के बीच की दूरी कम कर दी है। इससे आम नागरिक फिर से इस समस्या को प्रत्यक्ष रूप से महसूस करने लगा है।
प्रताप भानु मेहता का तर्क है कि आज चिंता केवल रिश्वत या भ्रष्टाचार तक सीमित नहीं है, बल्कि राजनीतिक शक्ति और आर्थिक शक्ति के गठजोड़ को लेकर भी है। उनके अनुसार आशंका यह है कि सत्ता का उपयोग कुछ चुनिंदा कंपनियों को लाभ पहुंचाने और उनके प्रतिस्पर्धियों को कमजोर करने के लिए किया जा सकता है, जिससे बाजार में एकाधिकार की स्थिति बन सकती है।
लेख में भाजपा और आरएसएस की राजनीति पर भी टिप्पणी की गई है। मेहता का कहना है कि जिन नेताओं पर कभी भ्रष्टाचार के आरोप लगाकर भाजपा ने राजनीतिक लड़ाई लड़ी थी, उनमें से कई बाद में उसी दल का हिस्सा बन गए। उनका मानना है कि केवल नैतिक उपदेशों से भ्रष्टाचार पर अंकुश नहीं लगाया जा सकता।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की व्यक्तिगत ईमानदारी पर चर्चा करते हुए मेहता लिखते हैं कि मुद्दा केवल व्यक्तिगत ईमानदारी का नहीं, बल्कि सत्ता के शीर्ष पर बैठे नेतृत्व की संस्थागत जिम्मेदारी और भ्रष्टाचार के मामलों पर उसकी प्रतिक्रिया का है। उनके अनुसार, मजबूत राजनीतिक बहुमत के बावजूद यदि भ्रष्टाचार के आरोपों पर अपेक्षित कार्रवाई नहीं होती, तो यह भी अपने आप में एक महत्वपूर्ण राजनीतिक संदेश देता है।
हालांकि, मेहता का मानना है कि भ्रष्टाचार को लेकर बढ़ती सार्वजनिक चिंता के बावजूद इसके खिलाफ व्यापक जनआंदोलन बनने की संभावना फिलहाल कमजोर दिखाई देती है। इसके पीछे वे आम आदमी पार्टी के अनुभव के बाद आंदोलनों से लोगों का मोहभंग, विपक्ष की नैतिक विश्वसनीयता पर सवाल और अभिजात वर्ग तथा मीडिया के सीमित समर्थन जैसी वजहों का उल्लेख करते हैं।
यह लेख इंडियन एक्सप्रेस में “When Corruption Does Not Make a Political Noise” शीर्षक से प्रकाशित हुआ है, जिसमें प्रताप भानु मेहता ने वर्तमान राजनीतिक और प्रशासनिक परिदृश्य में भ्रष्टाचार की बदलती प्रकृति और उसके राजनीतिक प्रभावों का विश्लेषण प्रस्तुत किया है।











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