हंसी, गलतफहमियां और हल्का-फुल्का मनोरंजन लेकर आई ‘पति-पत्नी और वो 2’

आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में जहां ऑफिस का तनाव और घर की रोजमर्रा की नोकझोंक इंसान को भीतर तक थका देती है, वहीं कुछ फिल्में ऐसी आती हैं जो दो घंटे के लिए दिमाग को आराम और चेहरे पर मुस्कान दे जाती हैं। ऐसी ही फिल्मों की कतार में शामिल होती है ‘पति-पत्नी और वो 2’, जो लॉजिक से ज्यादा मनोरंजन पर भरोसा करती है और दर्शकों को हंसाने का हर संभव प्रयास करती है।

गलतफहमियों में उलझा एक सीधा-सादा पति

फिल्म की कहानी प्रयागराज के एक फॉरेस्ट ऑफिसर प्रजापति के इर्द-गिर्द घूमती है, जिसकी जिंदगी तीन महिलाओं के बीच पैदा हुई गलतफहमियों में उलझ जाती है। कहानी का आधार बेहद साधारण है, लेकिन उसे जिस कॉमिक अंदाज में पेश किया गया है, वही फिल्म की असली ताकत बन जाता है।

प्रजापति ऐसा इंसान है जो जंगल के जानवरों तक को शांत कर देता है, लेकिन अपनी निजी जिंदगी की उथल-पुथल को संभालने में बार-बार फंसता नजर आता है। पत्नी, दोस्त और कॉलेज फ्रेंड के बीच पैदा हुई परिस्थितियां उसे ऐसी मुश्किलों में डालती हैं, जहां दर्शक लगातार हंसते भी हैं और उसके लिए थोड़ी सहानुभूति भी महसूस करते हैं।

स्क्रीनप्ले और कॉमेडी का संतुलन

फिल्म का स्क्रीनप्ले कहानी को लगातार आगे बढ़ाता है। कहीं-कहीं कुछ दृश्य खिंचे हुए जरूर लगते हैं, लेकिन फिल्म की छोटी अवधि उन्हें भारी नहीं बनने देती। ट्विस्ट, गलतफहमियां और कॉमिक मोमेंट्स लगातार आते रहते हैं, जिससे दर्शकों की दिलचस्पी बनी रहती है।

फिल्म की सबसे बड़ी खासियत यही है कि यह खुद को बहुत गंभीरता से नहीं लेती। यहां हर चीज लॉजिक के तराजू पर नहीं तौली गई है। कई बार ऐसे दृश्य आते हैं जहां दर्शकों के मन में “ऐसा कैसे हो सकता है?” जैसे सवाल उठते हैं, लेकिन फिल्म उन्हीं सवालों को नजरअंदाज कर सिर्फ मनोरंजन पर फोकस करती है।

80-90 के दशक की याद दिलाती फिल्म

फिल्म का ट्रीटमेंट पुराने दौर की हल्की-फुल्की कॉमेडी फिल्मों की याद दिलाता है। 80 और 90 के दशक की फिल्मों जैसा मासूम मनोरंजन इसमें दिखाई देता है। वहीं नई पीढ़ी के दर्शकों के लिए इसमें भरपूर फनी मोमेंट्स और रिलेशनशिप ड्रामा मौजूद है।

आयुष्मान खुराना का दमदार अंदाज

एक्टिंग की बात करें तो आयुष्मान खुराना एक बार फिर पूर्वी उत्तर प्रदेश की भाषा और अंदाज को बेहद सहजता से पर्दे पर उतारते हैं। उनकी डायलॉग डिलीवरी और कॉमिक टाइमिंग फिल्म की जान बन जाती है। ऐसा लगता है जैसे वह प्रयागराज की गलियों से सीधे इस किरदार को उठाकर लाए हों।

वामिका गब्बी ने पत्रकार और पत्नी के किरदार में अच्छा काम किया है। सिर्फ शक करने वाली पत्नी तक सीमित न रहकर उनका किरदार कई जगह कहानी को मजबूती देता है। वहीं सारा अली खान और रघुप्रीत सिंह फिल्म में कॉमेडी और कन्फ्यूजन का तड़का लगाने में सफल रहती हैं।

सहायक कलाकारों में विजय राज, दुर्गेश कुमार, तिग्मांशु धूलिया, आयशा रजा और शिवा चड्ढा जैसे कलाकार अपने छोटे-छोटे दृश्यों से फिल्म को और मजेदार बना देते हैं।

म्यूजिक और निर्देशन

फिल्म का संगीत कहानी के साथ सहजता से चलता है। गाने कहानी की गति को रोकते नहीं बल्कि उसे आगे बढ़ाने का काम करते हैं। बैकग्राउंड म्यूजिक भले ही लंबे समय तक याद न रहे, लेकिन फिल्म के माहौल के अनुरूप फिट बैठता है।

निर्देशक मुदस्सर अजीज एक बार फिर अपनी खास शैली में इलॉजिकल लेकिन एंटरटेनिंग कॉमेडी पेश करने में सफल नजर आते हैं। उनकी फिल्मों का मकसद दर्शकों को सोचने पर मजबूर करना नहीं, बल्कि उन्हें हल्का महसूस कराना होता है और इस मामले में यह फिल्म काफी हद तक सफल रहती है।

फाइनल वर्डिक्ट

अगर आप ऐसी फिल्म ढूंढ रहे हैं जो दिमाग पर ज्यादा जोर न डाले और सिर्फ हंसी-मजाक के जरिए आपका मूड फ्रेश कर दे, तो ‘पति-पत्नी और वो 2’ आपके लिए एक अच्छा विकल्प साबित हो सकती है। यह फिल्म लॉजिक से ज्यादा मनोरंजन में विश्वास करती है और उसी अंदाज में दर्शकों को बांधे रखती है।

वीकेंड पर हल्का-फुल्का मनोरंजन चाहिए तो यह फिल्म निराश नहीं करेगी।

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