केपीएस गिल: पंजाब में आतंकवाद के खिलाफ निर्णायक लड़ाई लड़ने वाले ‘सुपर कॉप’, जिनकी विरासत आज भी बहस का विषय है

नई दिल्ली: भारत के पुलिस इतिहास में कुछ नाम ऐसे हैं, जिन्हें उनकी असाधारण उपलब्धियों और विवादों दोनों के लिए याद किया जाता है। पंजाब में आतंकवाद के खिलाफ निर्णायक अभियान का नेतृत्व करने वाले पूर्व पुलिस महानिदेशक (DGP) कंवर पाल सिंह (केपीएस) गिल ऐसा ही एक नाम हैं। समर्थकों के लिए वे वह अधिकारी थे जिन्होंने पंजाब को आतंकवाद की आग से बाहर निकाला, जबकि आलोचकों के लिए उनकी कार्यशैली मानवाधिकारों और कानून के शासन पर गंभीर सवाल छोड़ गई।

असम कैडर से पंजाब तक का सफर

1957 बैच के भारतीय पुलिस सेवा (IPS) अधिकारी केपीएस गिल को असम कैडर आवंटित हुआ था। लगभग 28 वर्षों तक असम में सेवा देने के बाद वे राज्य के पुलिस प्रमुख बने। 1984 में पंजाब में उग्रवाद की चुनौती से निपटने के लिए उन्हें वहां भेजा गया। उन्होंने दो अलग-अलग कार्यकाल (1988–1990 और 1991–1995) में पंजाब पुलिस का नेतृत्व किया।

ऑपरेशन ब्लैक थंडर-2 से मिली बड़ी पहचान

मई 1988 में हुए ऑपरेशन ब्लैक थंडर-2 ने केपीएस गिल को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई। इस अभियान में सुरक्षा बलों ने स्वर्ण मंदिर परिसर में छिपे आतंकवादियों को घेर लिया। कई दिनों तक चले अभियान के बाद बड़ी संख्या में आतंकवादियों ने आत्मसमर्पण किया।

ऑपरेशन ब्लू स्टार के विपरीत इस अभियान में मीडिया को सीमित रूप से घटनास्थल तक पहुंचने की अनुमति दी गई। टेलीविजन पर प्रसारित आत्मसमर्पण की तस्वीरों ने आतंकवादियों की छवि को बड़ा झटका दिया और सुरक्षा बलों का मनोबल बढ़ाया।

हालांकि इस अभियान का नेतृत्व राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड (NSG) ने किया था, लेकिन केपीएस गिल इसकी सबसे प्रमुख सार्वजनिक पहचान बनकर उभरे।

अग्रिम मोर्चे पर रहने वाले अधिकारी

केपीएस गिल की पहचान एक ऐसे पुलिस अधिकारी की थी जो केवल दफ्तर में बैठकर आदेश देने के बजाय स्वयं अभियान स्थलों पर पहुंचते थे। कई संस्मरणों और पुस्तकों में उल्लेख मिलता है कि किसी मुठभेड़ की सूचना मिलते ही वे हेलीकॉप्टर से घटनास्थल पहुंच जाते थे और कई बार सुरक्षाबलों के साथ अग्रिम पंक्ति में मौजूद रहते थे।

उनके आलोचक भी इस बात से इनकार नहीं करते कि वे जोखिम उठाने वाले और नेतृत्व क्षमता से भरपूर अधिकारी थे।

आतंकवाद पर कठोर रणनीति

गिल का मानना था कि पंजाब में आतंकवाद का मुकाबला केवल आक्रामक पुलिस कार्रवाई से ही संभव है। उन्होंने आतंकवादियों को विभिन्न श्रेणियों में बांटकर उनके खिलाफ लक्षित अभियान चलाए।

उनकी रणनीति का समर्थकों का दावा है कि इससे पंजाब में आतंकवाद की कमर टूट गई। वहीं आलोचकों का कहना है कि इसी दौर में फर्जी मुठभेड़ों, गैरकानूनी हिरासतों और मानवाधिकार उल्लंघन के आरोप भी व्यापक स्तर पर सामने आए।

मानवाधिकारों को लेकर उठे गंभीर सवाल

केपीएस गिल के कार्यकाल पर सबसे बड़ी आलोचना पुलिस द्वारा कथित फर्जी मुठभेड़ों और मानवाधिकार उल्लंघनों को लेकर हुई। कई पूर्व पुलिस अधिकारियों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और लेखकों ने आरोप लगाया कि आतंकवाद विरोधी अभियान के दौरान कई मामलों में कानून की निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया।

हालांकि गिल ने हमेशा इन आरोपों से इनकार करते हुए कहा कि सरकार की कोई आधिकारिक नीति गैरकानूनी हत्याओं या मानवाधिकार उल्लंघनों की नहीं थी। उनका तर्क था कि पंजाब बेहद असाधारण परिस्थितियों से गुजर रहा था और पुलिस कठिन हालात में काम कर रही थी।

बेबाक और प्रभावशाली व्यक्तित्व

केपीएस गिल अपने बेबाक स्वभाव और प्रशासनिक दृढ़ता के लिए भी जाने जाते थे। राज्यपालों और वरिष्ठ अधिकारियों के साथ मतभेदों की कई घटनाएं चर्चित रहीं। वे पुलिस की स्वायत्तता और मनोबल को लेकर बेहद मुखर रहते थे और सार्वजनिक रूप से भी अपनी बात रखने से नहीं हिचकते थे।

किताबों और कविता के शौकीन

कठोर पुलिस अधिकारी की छवि के पीछे एक संवेदनशील व्यक्तित्व भी था। उनके करीबी बताते हैं कि उन्हें साहित्य और कविता पढ़ने का गहरा शौक था। व्यस्त और तनावपूर्ण दौर में भी वे अंग्रेजी कवि विलियम वर्ड्सवर्थ की कविताएं पढ़कर मानसिक संतुलन बनाए रखने की कोशिश करते थे।

निजी जीवन के विवाद

जुलाई 1988 में एक वरिष्ठ महिला आईएएस अधिकारी ने केपीएस गिल पर एक सामाजिक समारोह में अनुचित व्यवहार का आरोप लगाया। मामला अदालत तक पहुंचा और सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें दोषी ठहराते हुए सजा बरकरार रखी। बाद में उन्हें परिवीक्षा (Probation) का लाभ दिया गया और पीड़िता को मुआवजा देने का आदेश भी दिया गया।

इसके अलावा 1995 में मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा की हत्या के मामले में भी पंजाब पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठे। हालांकि इस मामले में केपीएस गिल को प्रत्यक्ष रूप से दोषी नहीं ठहराया गया, लेकिन पुलिस की आतंकवाद विरोधी रणनीति व्यापक बहस का विषय बनी रही।

पुलिस सेवा के बाद भी सक्रिय भूमिका

सेवानिवृत्ति के बाद भी विभिन्न राज्य सरकारों ने सुरक्षा मामलों में उनकी सलाह ली। 2002 के गुजरात दंगों के बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें सुरक्षा सलाहकार बनाया। वहीं 2006 में छत्तीसगढ़ सरकार ने नक्सलवाद से निपटने की रणनीति तैयार करने में भी उनकी विशेषज्ञता का उपयोग किया।

सम्मान और विरासत

आतंकवाद के खिलाफ उनकी भूमिका को देखते हुए भारत सरकार ने 1989 में उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया।

2017 में केपीएस गिल का निधन हो गया। उनके निधन पर कई राजनीतिक और प्रशासनिक हस्तियों ने उन्हें श्रद्धांजलि दी। पूर्व केंद्रीय मंत्री अरुण शौरी ने कहा था कि “केपीएस गिल ने केवल पंजाब ही नहीं, बल्कि भारत की एकता को भी बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।”

निष्कर्ष

केपीएस गिल भारतीय पुलिस इतिहास के सबसे प्रभावशाली और सबसे विवादास्पद अधिकारियों में गिने जाते हैं। एक पक्ष उन्हें पंजाब में आतंकवाद के खात्मे का नायक मानता है, जबकि दूसरा पक्ष उनकी कार्यशैली को लोकतांत्रिक मूल्यों और मानवाधिकारों की कसौटी पर कठोर आलोचना के साथ देखता है।

आज भी उनकी विरासत इस सवाल के साथ जुड़ी हुई है कि क्या असाधारण सुरक्षा चुनौतियों से निपटने के लिए असाधारण तरीके अपनाए जा सकते हैं, या कानून का शासन हर परिस्थिति में सर्वोपरि रहना चाहिए।

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