इसरो से वैज्ञानिकों का पलायन: क्या भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम के लिए खतरे की घंटी?

नई दिल्ली: भारत की अंतरिक्ष एजेंसी इसरो (ISRO) ने चंद्रयान-3, मंगलयान और आदित्य-एल1 जैसे मिशनों के जरिए दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाई है। लेकिन इन उपलब्धियों के बीच एक ऐसी खबर सामने आई है जिसने वैज्ञानिक समुदाय और नीति-निर्माताओं की चिंता बढ़ा दी है। रिपोर्टों के अनुसार, पिछले कुछ महीनों में 100 से अधिक वैज्ञानिक इसरो छोड़ चुके हैं। इनमें कई वरिष्ठ वैज्ञानिक और बड़े मिशनों से जुड़े अधिकारी भी शामिल बताए जा रहे हैं।

हालांकि इसरो ने इस्तीफा देने वालों की कुल संख्या की आधिकारिक पुष्टि नहीं की है, लेकिन संस्थान के अध्यक्ष डॉ. वी. नारायण ने यह स्वीकार किया है कि वैज्ञानिकों के इस्तीफे हुए हैं। उनका कहना है कि किसी एक वैज्ञानिक के जाने से मिशन प्रभावित नहीं होने दिए जाएंगे और उनकी जिम्मेदारियां अन्य अधिकारियों को सौंप दी जाती हैं।

किन केंद्रों से सबसे ज्यादा इस्तीफे?

रिपोर्टों के अनुसार, बेंगलुरु स्थित यू.आर. राव सैटेलाइट सेंटर (URSC) से लगभग 80 और तिरुवनंतपुरम स्थित विक्रम साराभाई स्पेस सेंटर (VSSC) से करीब 20 वैज्ञानिक इस्तीफा दे चुके हैं। इस्तीफा देने वालों में एलवीएम-3 (LVM-3) और स्पेडेक्स (SpaDeX) जैसे महत्वपूर्ण मिशनों से जुड़े वरिष्ठ अधिकारी भी शामिल बताए जा रहे हैं। चंद्रयान-3 मिशन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले वैज्ञानिकों के नाम भी इस सूची में सामने आए हैं।

चिंता संख्या की नहीं, अनुभव की है

इसरो में 14,600 से अधिक कर्मचारी कार्यरत हैं। ऐसे में 100–120 वैज्ञानिकों का जाना कुल संख्या के हिसाब से बहुत बड़ा आंकड़ा नहीं माना जा सकता। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि चिंता का विषय यह है कि संस्थान ऐसे अनुभवी वैज्ञानिकों को खो रहा है जिन्होंने वर्षों तक जटिल अंतरिक्ष मिशनों पर काम किया है।

गगनयान, चंद्रयान-4, भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन और भविष्य के मानव अंतरिक्ष मिशनों में अनुभवी वैज्ञानिकों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होगी। ऐसे अनुभव की भरपाई नई भर्ती से तुरंत संभव नहीं होती।

इस्तीफों पर रोक लगाने के निर्देश

14 जुलाई 2026 को अंतरिक्ष विभाग ने एक महत्वपूर्ण आदेश जारी किया। इसमें सभी इसरो केंद्रों के प्रमुखों को निर्देश दिया गया कि गगनयान और अन्य महत्वपूर्ण परियोजनाओं से जुड़े वैज्ञानिकों के इस्तीफे या स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति (VRS) के आवेदन सामान्य प्रक्रिया से मंजूर न किए जाएं।

ऐसे सभी मामलों को अंतिम निर्णय के लिए सीधे अंतरिक्ष विभाग के पास भेजा जाएगा। इस आदेश का उद्देश्य संवेदनशील मिशनों पर कार्यरत अनुभवी वैज्ञानिकों को तत्काल संस्थान छोड़ने से रोकना बताया गया है।

आखिर वैज्ञानिक क्यों छोड़ रहे हैं इसरो?

विशेषज्ञों के अनुसार इसके पीछे कई संभावित कारण हो सकते हैं—

– निजी स्पेस कंपनियों का तेजी से विस्तार: 2023 की भारतीय अंतरिक्ष नीति के बाद अनेक स्पेस स्टार्टअप और निजी कंपनियां सामने आई हैं।
– बेहतर वेतन और स्टॉक ऑप्शन: निजी कंपनियां आकर्षक वेतन, शेयर और बेहतर करियर ग्रोथ का अवसर दे रही हैं।
– काम करने की अधिक स्वतंत्रता: नई तकनीकों पर तेजी से काम करने और निर्णय लेने की स्वतंत्रता वैज्ञानिकों को आकर्षित कर रही है।
– निर्णय प्रक्रिया को लेकर असंतोष: कुछ रिपोर्टों में दावा किया गया है कि तकनीकी और प्रशासनिक फैसलों का अत्यधिक केंद्रीकरण भी असंतोष की वजह हो सकता है, हालांकि इसरो ने इस पर कोई आधिकारिक टिप्पणी नहीं की है।

आंकड़े क्या कहते हैं?

इसरो के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, 2018 से 2022 के बीच 381 वैज्ञानिकों ने संस्थान छोड़ा था। वहीं 2023 और 2024 के दौरान भी दर्जनों वैज्ञानिक बेहतर अवसरों के लिए निजी क्षेत्र की ओर गए। इससे साफ संकेत मिलता है कि भारत के अंतरिक्ष क्षेत्र में निजी कंपनियों के बढ़ते प्रभाव ने वैज्ञानिकों के लिए नए विकल्प खोल दिए हैं।

सरकार का पक्ष

केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह का कहना है कि इतने बड़े संस्थान में कर्मचारियों का आना-जाना सामान्य प्रक्रिया है। उनके अनुसार किसी एक व्यक्ति के जाने से कोई मिशन नहीं रुकता और अनुभवी सेवानिवृत्त वैज्ञानिक भी समय-समय पर इसरो की परियोजनाओं में योगदान देते रहते हैं।

आगे की सबसे बड़ी चुनौती

इसरो ने 2026 में 1,000 से अधिक वैज्ञानिक, तकनीकी और प्रशासनिक पदों पर भर्ती की प्रक्रिया शुरू की है। लेकिन केवल नई नियुक्तियां पर्याप्त नहीं होंगी। सबसे बड़ी चुनौती उन वैज्ञानिकों को संस्थान में बनाए रखना है जिनके अनुभव पर भारत के महत्वाकांक्षी मिशनों की सफलता टिकी हुई है।

भारत आने वाले वर्षों में गगनयान, चंद्रयान-4, भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन और चंद्रमा से जुड़े कई बड़े मिशनों की तैयारी कर रहा है। ऐसे समय में अनुभवी वैज्ञानिकों का लगातार संस्थान छोड़ना केवल मानव संसाधन का मुद्दा नहीं, बल्कि राष्ट्रीय रणनीतिक क्षमता से जुड़ा विषय बन सकता है।

निष्कर्ष

इसरो आज भी दुनिया की सबसे भरोसेमंद और किफायती अंतरिक्ष एजेंसियों में गिना जाता है। लेकिन किसी भी वैज्ञानिक संस्थान की असली ताकत उसकी इमारतें या मशीनें नहीं, बल्कि वहां काम करने वाले लोग होते हैं। यदि अनुभवी वैज्ञानिक लगातार निजी क्षेत्र की ओर रुख करते रहे, तो भविष्य के मिशनों की गति और गुणवत्ता दोनों प्रभावित हो सकती हैं।

अब सरकार और इसरो के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या नई भर्तियों के साथ-साथ वे ऐसा कार्य वातावरण, अवसर और प्रोत्साहन दे पाएंगे जिससे देश के सर्वश्रेष्ठ वैज्ञानिक भारत के सबसे महत्वपूर्ण अंतरिक्ष संस्थान में लंबे समय तक बने रहें?

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