भारत के सबसे भयावह आतंकी हमलों में शामिल 2008 अहमदाबाद सीरियल ब्लास्ट केस में गुजरात हाईकोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए विशेष अदालत के निर्णय को बरकरार रखा है। 7 जुलाई को दिए गए इस फैसले में हाईकोर्ट ने 49 दोषियों में से 38 को फांसी और 11 को उम्रकैद की सजा को सही ठहराया। एक ही आपराधिक मामले में इतनी बड़ी संख्या में दोषियों को मृत्युदंड दिए जाने के कारण यह फैसला भारतीय न्यायिक इतिहास के दुर्लभ मामलों में गिना जा रहा है।
70 मिनट में 21 धमाके, दहल उठा था अहमदाबाद
26 जुलाई 2008 की शाम अहमदाबाद शहर ने ऐसा मंजर देखा, जिसे आज भी लोग भूल नहीं पाए हैं। महज 70 मिनट के भीतर शहर के अलग-अलग इलाकों में 21 सिलसिलेवार बम धमाके हुए। इन विस्फोटों में 56 लोगों की मौत हुई, जबकि 200 से अधिक लोग घायल हुए।
धमाके भीड़भाड़ वाले बाजारों, बसों, सार्वजनिक स्थानों और अस्पतालों के आसपास किए गए थे। आतंकियों का मकसद अधिकतम जनहानि करना था।
अस्पताल भी बने आतंकियों का निशाना
इस हमले का सबसे भयावह पहलू यह था कि आतंकवादियों ने उन अस्पतालों को भी निशाना बनाया, जहां पहले हुए धमाकों के घायल इलाज के लिए पहुंच रहे थे।
अहमदाबाद के सिविल अस्पताल के ट्रॉमा सेंटर के बाहर खड़ी एक कार में शक्तिशाली विस्फोट हुआ। इस धमाके में ऑर्थोपेडिक सर्जन डॉ. प्रेरक शाह, उनकी गर्भवती पत्नी डॉ. किंजल शाह और उनका अजन्मा बच्चा सहित कई लोगों की मौत हो गई।
इसी तरह एल.जी. अस्पताल के बाहर भी कार बम विस्फोट किया गया, जिसमें कई निर्दोष लोगों ने अपनी जान गंवाई।
इन घटनाओं ने स्पष्ट कर दिया था कि हमले का उद्देश्य केवल धमाका करना नहीं, बल्कि बचाव कार्यों को भी निशाना बनाकर मौत का आंकड़ा बढ़ाना था।
इंडियन मुजाहिदीन ने ली थी जिम्मेदारी
धमाकों के कुछ मिनट पहले कई समाचार चैनलों को एक ईमेल भेजा गया था, जिसमें आतंकी संगठन इंडियन मुजाहिदीन (IM) ने हमले की जिम्मेदारी ली थी।
ईमेल में 2002 के गुजरात दंगों और बाबरी मस्जिद विध्वंस का उल्लेख करते हुए इन्हें हमले का कथित कारण बताया गया था।
अहमदाबाद हमलों से ठीक एक दिन पहले बेंगलुरु में भी धमाके हुए थे, जबकि अगले ही दिन सूरत से बड़ी संख्या में जिंदा बम बरामद किए गए। इसके कुछ सप्ताह बाद दिल्ली में भी सिलसिलेवार विस्फोट हुए। वर्ष 2008 भारत के लिए आतंकी हमलों का बेहद चुनौतीपूर्ण वर्ष साबित हुआ।
17 वर्षों तक चला लंबा मुकदमा
इस मामले में शुरुआत में अहमदाबाद और सूरत में कुल 35 एफआईआर दर्ज की गईं।
जांच के दौरान देश के विभिन्न राज्यों से 78 आरोपियों को गिरफ्तार किया गया। उन पर भारतीय दंड संहिता (तत्कालीन आईपीसी), गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (UAPA), विस्फोटक पदार्थ अधिनियम, शस्त्र अधिनियम और सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम सहित कई कानूनों के तहत मुकदमा चलाया गया।
सुरक्षा कारणों से आरोपियों को साबरमती सेंट्रल जेल में रखा गया और वहीं विशेष अदालत में मुकदमे की सुनवाई हुई।
यह मुकदमा लगभग 17 वर्षों तक चला और इस दौरान 9 अलग-अलग न्यायाधीशों ने इसकी सुनवाई की।
2022 में आया ऐतिहासिक विशेष अदालत का फैसला
फरवरी 2022 में विशेष अदालत ने अपना बहुप्रतीक्षित फैसला सुनाया।
कुल 78 आरोपियों में से एक आरोपी सरकारी गवाह बन गया। शेष 77 आरोपियों में 49 को दोषी और 28 को बरी कर दिया गया।
विशेष अदालत ने दोषियों को हत्या, देश के खिलाफ युद्ध छेड़ने, आपराधिक षड्यंत्र और आतंकवादी गतिविधियों सहित कई गंभीर अपराधों का दोषी माना।
करीब 7000 पन्नों के फैसले में अदालत ने इस मामले को “रेयरेस्ट ऑफ द रेयर” श्रेणी का बताते हुए 38 दोषियों को फांसी और 11 को आजीवन कारावास की सजा सुनाई।
साथ ही दोषियों पर आर्थिक दंड भी लगाया गया, जिसकी राशि पीड़ित परिवारों के मुआवजे के लिए निर्धारित की गई।
हाईकोर्ट ने बरकरार रखा फैसला
गुजरात हाईकोर्ट की खंडपीठ ने विशेष अदालत के निर्णय की विस्तृत समीक्षा करने के बाद दोषियों के खिलाफ सुनाई गई सजाओं को बरकरार रखा।
अदालत ने माना कि यह एक सुनियोजित आतंकी साजिश थी, जिसका उद्देश्य आम नागरिकों में भय फैलाना और अधिकतम जनहानि करना था।
हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को पीड़ितों को मुआवजा देने का भी निर्देश दिया।
निर्देश के अनुसार—
– मृतकों के परिजनों को 1 लाख रुपये,
– गंभीर रूप से घायलों को 5 लाख रुपये,
– सामान्य रूप से घायल लोगों को 1 लाख रुपये का मुआवजा दिया जाएगा।
मुआवजे का भुगतान 31 मार्च 2027 तक सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए हैं।
भारतीय न्यायिक इतिहास का दुर्लभ फैसला
एक ही मामले में 38 दोषियों को फांसी की सजा बरकरार रहना भारतीय न्यायिक इतिहास की सबसे असाधारण घटनाओं में से एक माना जा रहा है।
इससे पहले 1998 में विशेष अदालत ने पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या के मामले में 26 दोषियों को मृत्युदंड सुनाया था, हालांकि बाद में उच्च अदालतों ने उन सजाओं में बदलाव कर दिया था।
न्याय और आतंकवाद के खिलाफ कड़ा संदेश
अहमदाबाद सीरियल ब्लास्ट केवल एक आतंकी हमला नहीं था, बल्कि निर्दोष नागरिकों, डॉक्टरों, मरीजों और अस्पतालों तक को निशाना बनाने वाली एक सुनियोजित साजिश थी। इस मामले में आया गुजरात हाईकोर्ट का फैसला यह संदेश देता है कि आतंकवाद जैसे जघन्य अपराधों में न्यायिक प्रक्रिया भले लंबी हो, लेकिन कानून के दायरे में दोषियों की जवाबदेही तय की जाती है।
करीब 17 वर्षों तक चली न्यायिक प्रक्रिया के बाद यह फैसला उन पीड़ित परिवारों के लिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जिन्होंने वर्षों तक न्याय का इंतजार किया।












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