तमिलनाडु के बहुचर्चित संताकुलम कस्टोडियल डेथ केस में आखिरकार न्याय मिल गया है। करीब छह साल लंबे इंतजार के बाद 7 अप्रैल 2026 को मदुरई की फर्स्ट एडिशनल डिस्ट्रिक्ट एंड सेशंस कोर्ट ने इस मामले में दोषी पाए गए नौ पुलिसकर्मियों को मौत की सजा सुनाई है। यह मामला 2020 में हुए एक दिल दहला देने वाले डबल मर्डर से जुड़ा है, जिसने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया था।
यह घटना तमिलनाडु के दक्षिणी शहर संताकुलम में हुई थी, जहां 58 वर्षीय व्यापारी पी. जयराज और उनके 31 वर्षीय बेटे जे. बेनिक्स को पुलिस हिरासत में बर्बर तरीके से पीटा गया था। दोनों की मौत गंभीर चोटों और अत्यधिक रक्तस्राव के कारण हो गई थी। जयराज को कथित तौर पर कोविड-19 लॉकडाउन नियमों के उल्लंघन के आरोप में हिरासत में लिया गया था, जबकि उनके बेटे बेनिक्स को केवल अपने पिता से मिलने के लिए पुलिस स्टेशन पहुंचने पर गिरफ्तार कर लिया गया।
जांच में सामने आया कि दोनों को गैरकानूनी तरीके से हिरासत में रखकर पूरी रात यातनाएं दी गईं। सीबीआई की चार्जशीट के मुताबिक, जयराज पर लगाए गए आरोप भी आधारहीन थे। पुलिसकर्मियों ने न केवल उन्हें बेरहमी से पीटा, बल्कि सबूत मिटाने के लिए कई प्रयास भी किए। यहां तक कि खून से सने फर्श को साफ कराने के लिए अलग से कर्मचारी बुलाया गया।
परिवार के सदस्यों के अनुसार, दोनों को मजिस्ट्रेट के सामने ठीक से पेश नहीं किया गया और बिना उचित जांच के रिमांड दे दिया गया। गंभीर चोटों के बावजूद ‘फिट फॉर रिमांड’ का प्रमाणपत्र भी हासिल कर लिया गया, जो बाद में जांच के दौरान फर्जी साबित हुआ।
22 जून 2020 को बेनिक्स की अस्पताल में मौत हो गई, जबकि अगले दिन उनके पिता जयराज ने भी दम तोड़ दिया। इस घटना के बाद पूरे तमिलनाडु में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए। लोगों ने इस अमानवीय व्यवहार के खिलाफ सड़कों पर उतरकर न्याय की मांग की।
मामले की गंभीरता को देखते हुए मद्रास हाईकोर्ट की मदुरई बेंच ने स्वतः संज्ञान लिया और जांच के आदेश दिए। प्रारंभिक जांच राज्य की सीबीसीआईडी को सौंपी गई, जिसके बाद मामला सीबीआई को ट्रांसफर कर दिया गया। इस केस में महिला हेड कांस्टेबल एस. रेवती का बयान बेहद अहम साबित हुआ, जिसकी सुरक्षा के लिए विशेष इंतजाम भी किए गए थे।
23 मार्च 2026 को कोर्ट ने सभी नौ आरोपियों को दोषी ठहराया था, जबकि सजा पर फैसला 7 अप्रैल को सुनाया गया। एक अन्य आरोपी, तत्कालीन स्पेशल सब-इंस्पेक्टर पलदुरई की 2020 में कोविड-19 के कारण मृत्यु हो चुकी थी।
हालांकि, दोषी पुलिसकर्मियों के पास अब भी उच्च अदालत में अपील करने का विकल्प मौजूद है। यह मामला न केवल पुलिस अत्याचार की भयावहता को उजागर करता है, बल्कि न्यायिक प्रणाली की मजबूती और लंबी कानूनी प्रक्रिया को भी दर्शाता है।
इस फैसले को न्याय की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है, लेकिन यह सवाल भी उठाता है कि क्या भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोका जा सकेगा।




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