क्लीनिकली डेड होकर लौटे लोगों के दावों ने बढ़ाए विज्ञान और अध्यात्म के सवाल
क्या मौत सचमुच जिंदगी का आखिरी पड़ाव है या फिर एक ऐसी रहस्यमयी यात्रा की शुरुआत, जिसके बारे में विज्ञान और अध्यात्म दोनों आज भी पूरी तरह जवाब नहीं दे पाए हैं? हाल के वर्षों में दुनियाभर में सामने आए “नियर डेथ एक्सपीरियंस” यानी मौत के बेहद करीब पहुंचकर लौटे लोगों के अनुभवों ने इस बहस को और गहरा कर दिया है।
ऐसे हजारों लोगों ने दावा किया है कि क्लीनिकली डेड घोषित होने के बाद भी उन्होंने अपने आसपास की आवाजें सुनीं, डॉक्टरों को काम करते देखा और यहां तक कि खुद को अपने शरीर के ऊपर तैरता हुआ महसूस किया। इन अनुभवों को लेकर विज्ञान शोध कर रहा है, वहीं भारतीय ग्रंथ जैसे गरुड़ पुराण सदियों पहले से ऐसी यात्राओं का वर्णन करते आए हैं।
मौत के बाद भी कुछ देर तक सक्रिय रहता है दिमाग?
न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी की “अवेयर सेकंड स्टडी” में यह सामने आया कि कुछ मरीजों में दिल की धड़कन रुकने के बाद भी दिमाग में गामा वेव्स सक्रिय थीं। वैज्ञानिकों का मानना है कि इस दौरान इंसान की चेतना कुछ समय तक यादों और आसपास की घटनाओं को महसूस कर सकती है।
इसी को कई विशेषज्ञ “लाइफ रिव्यू” कहते हैं, जिसमें व्यक्ति को अपनी पूरी जिंदगी किसी फिल्म की तरह दिखाई देती है। दिलचस्प बात यह है कि गरुड़ पुराण में भी मृत्यु के बाद आत्मा द्वारा अपने कर्मों का लेखा-जोखा देखने का उल्लेख मिलता है।
सुरंग, रोशनी और दिवंगत रिश्तेदार
नियर डेथ एक्सपीरियंस से लौटे कई लोगों ने बताया कि उन्होंने एक लंबी अंधेरी सुरंग देखी, जिसके अंत में बेहद शांत और तेज रोशनी थी। कई लोगों ने अपने उन रिश्तेदारों को देखने का दावा भी किया जो वर्षों पहले दुनिया छोड़ चुके थे।
वैज्ञानिक इसे ऑक्सीजन की कमी से जुड़ी मस्तिष्कीय प्रतिक्रिया मानते हैं, लेकिन एक तथ्य ने विशेषज्ञों को भी चौंकाया। कुछ अध्ययनों में जन्म से दृष्टिहीन लोगों ने भी मौत के करीब पहुंचने पर “रोशनी” और “रंग” देखने का दावा किया। यह सवाल आज भी अनसुलझा है कि जिसने कभी दुनिया देखी ही नहीं, वह रंगों और प्रकाश का अनुभव कैसे कर सकता है।
गरुड़ पुराण और यमलोक की यात्रा
गरुड़ पुराण में मृत्यु के बाद आत्मा की यात्रा का विस्तार से वर्णन है। इसमें वैतरणी नदी, 16 नगरों और कर्मों के आधार पर खुलने वाले यमलोक के द्वारों का जिक्र मिलता है।
पुराणों के अनुसार, आत्मा अपने कर्मों के अनुसार सुख या कष्ट का अनुभव करती है। इसे आधुनिक भाषा में ऐसे समझा जा सकता है जैसे इंसान के हर कर्म और विचार का एक “कॉस्मिक रिकॉर्ड” तैयार हो रहा हो। चित्रगुप्त को इसी प्रतीकात्मक लेखा-जोखा का संरक्षक माना गया है।
क्या मौत के बाद आत्मा वापस लौट सकती है?
कई मेडिकल केस स्टडीज में मरीजों ने ऑपरेशन थिएटर के अंदर की ऐसी घटनाएं सही-सही बताईं जिन्हें वे सामान्य स्थिति में नहीं देख सकते थे। इससे यह बहस और तेज हो गई कि क्या चेतना शरीर से अलग भी अस्तित्व रखती है।
गरुड़ पुराण में “प्राणसूत्र” का उल्लेख मिलता है, जिसे चांदी जैसी चमकती डोरी बताया गया है। कहा जाता है कि जब तक यह डोरी शरीर से जुड़ी रहती है, आत्मा वापस लौट सकती है। नियर डेथ एक्सपीरियंस से लौटे कई लोगों ने भी इसी तरह की “सिल्वर कॉर्ड” देखने का दावा किया है।
विज्ञान और अध्यात्म के बीच अनसुलझा रहस्य
आधुनिक विज्ञान अभी तक इन अनुभवों की पूरी व्याख्या नहीं कर पाया है। कुछ वैज्ञानिक इसे दिमाग की अंतिम गतिविधियां मानते हैं, जबकि अध्यात्म इसे आत्मा की यात्रा का प्रमाण बताता है।
हालांकि एक बात दोनों पक्षों में समान दिखाई देती है — इंसान के कर्मों का महत्व। भारतीय ग्रंथों में कहा गया है कि अगले जन्म और मोक्ष का मार्ग व्यक्ति के कर्म तय करते हैं।
मौत को छूकर लौटे कई लोगों का कहना है कि उस अनुभव के बाद उनका जीवन पूरी तरह बदल गया। वे अधिक शांत, संवेदनशील और सकारात्मक हो गए। शायद यही इस रहस्य का सबसे बड़ा संदेश भी है — जिंदगी केवल सांसों का नाम नहीं, बल्कि कर्मों का सफर है।



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