नई दिल्ली, 21 जुलाई। संसद मार्च के दौरान छात्रों और प्रदर्शनकारियों की अप्रत्याशित भीड़ ने दिल्ली पुलिस की तैयारियों और खुफिया आकलन पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। संसद के मानसून सत्र के पहले दिन हुए इस प्रदर्शन में पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच कई स्थानों पर हिंसक झड़पें हुईं। लाठीचार्ज, आंसू गैस और बैरिकेड तोड़े जाने की घटनाओं के बीच दोनों पक्षों के कई लोग घायल हुए।
प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार संसद मार्ग, रायसीना रोड और आसपास के इलाकों में सुबह से ही भारी संख्या में छात्र और युवा जुटने लगे थे। शुरुआती चरण में पुलिस ने बैरिकेडिंग और सुरक्षा बलों की तैनाती के जरिए भीड़ को नियंत्रित करने का प्रयास किया, लेकिन दोपहर तक हालात बिगड़ गए। कई जगह प्रदर्शनकारियों ने बैरिकेड तोड़ने की कोशिश की, जबकि पुलिस ने उन्हें रोकने के लिए लाठीचार्ज और आंसू गैस का इस्तेमाल किया। इस दौरान कई प्रदर्शनकारियों के घायल होने के वीडियो सामने आए, वहीं पुलिसकर्मियों के भी चोटिल होने की खबरें मिलीं।
सूत्रों के अनुसार, जंतर-मंतर पर प्रदर्शन स्थल की क्षमता लगभग 3,000 लोगों की थी, जबकि 19 जुलाई की शाम तक वहां करीब 4,000 लोग पहुंच चुके थे। पुलिस का अनुमान था कि 20 जुलाई को 7,000 से 8,000 प्रदर्शनकारी शामिल होंगे, लेकिन अगले दिन देश के विभिन्न हिस्सों से छात्रों के पहुंचने के बाद दोपहर तक भीड़ करीब 15,000 तक पहुंच गई। इसी गलत आकलन को सुरक्षा व्यवस्था की सबसे बड़ी चुनौती माना जा रहा है।
हालांकि दिल्ली पुलिस ने पहले से 32 कंपनियां अर्धसैनिक बलों की तैनात की थीं और नई दिल्ली जिले में 2,000 से अधिक सुरक्षाकर्मी लगाए गए थे। संसद मार्ग, रायसीना रोड और डॉ. राजेंद्र प्रसाद रोड सहित संवेदनशील इलाकों में बहुस्तरीय बैरिकेडिंग, दंगा-रोधी उपकरण और आंसू गैस के इंतजाम भी किए गए थे। बावजूद इसके भीड़ के आकार और उसकी आवाजाही का सही अनुमान नहीं लगाया जा सका।
स्थिति बिगड़ने पर दिल्ली पुलिस ने राजधानी के अन्य 14 जिलों से अतिरिक्त बल बुलाया। प्रत्येक जिले से एक एसीपी और लगभग 100 पुलिसकर्मियों को तत्काल नई दिल्ली भेजने के निर्देश दिए गए। वरिष्ठ अधिकारियों ने प्रदर्शनकारियों के प्रतिनिधियों से बातचीत कर सीमित संख्या में मार्च निकालने का प्रस्ताव भी रखा, लेकिन सहमति नहीं बन सकी।
प्रदर्शन के दौरान कई स्थानों पर हिंसा भी देखने को मिली। पुलिस का कहना है कि प्रदर्शनकारियों की ओर से पत्थर, बोतलें और अन्य वस्तुएं फेंकी गईं, जिससे कई पुलिसकर्मी घायल हुए। दूसरी ओर प्रदर्शनकारियों ने पुलिस पर अत्यधिक बल प्रयोग का आरोप लगाया। देर शाम तक दोनों पक्षों में झड़पें जारी रहीं और स्थिति को नियंत्रित करने में सुरक्षा एजेंसियों को काफी समय लगा।
ग्राउंड रिपोर्ट्स के अनुसार, कई पुलिसकर्मी लंबे समय तक लगातार ड्यूटी के कारण थके हुए दिखाई दिए। कुछ जवानों के पास पूर्ण दंगा-रोधी सुरक्षा उपकरण भी नहीं थे। जैसे-जैसे भीड़ बढ़ती गई, पुलिस की फॉर्मेशन टूटती गई और भीड़ नियंत्रण की रणनीति धीरे-धीरे बल प्रयोग में बदलती चली गई।
घटनाक्रम के बाद सुरक्षा विशेषज्ञों ने सवाल उठाया है कि जब संसद मार्च की घोषणा पहले से सार्वजनिक थी और सोशल मीडिया के माध्यम से देशभर के छात्रों को इसमें शामिल होने का आह्वान किया जा रहा था, तब भी भीड़ के वास्तविक आकार का अनुमान क्यों नहीं लगाया जा सका।
विश्लेषकों का मानना है कि यदि समय रहते आंदोलनकारियों और सरकार के बीच प्रभावी संवाद स्थापित हो जाता, तो टकराव की स्थिति टाली जा सकती थी। इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर बड़े सार्वजनिक आंदोलनों के दौरान खुफिया तंत्र, भीड़ प्रबंधन और प्रशासनिक समन्वय की प्रभावशीलता पर बहस को तेज कर दिया है।












Leave a Reply