मुंबई-अहमदाबाद बुलेट ट्रेन: क्या भारत की वजह से अटका प्रोजेक्ट? जापान के पूर्व मंत्री के आरोपों की पूरी पड़ताल

नई दिल्ली: मुंबई-अहमदाबाद बुलेट ट्रेन परियोजना एक बार फिर चर्चा में है। वजह बने हैं जापान के पूर्व कानून मंत्री हिदेकी माकीहारा, जिनका 17 जुलाई को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर किया गया एक पोस्ट तेजी से वायरल हुआ। इस पोस्ट में उन्होंने भारत पर परियोजना में देरी के लिए गंभीर आरोप लगाए। उनका दावा था कि भारतीय पक्ष का रवैया बातचीत के दौरान अड़ियल और लापरवाह रहा, किए गए वादों से पीछे हटने की प्रवृत्ति रही और इसी कारण परियोजना लगातार विलंबित होती चली गई।

हालांकि भारत सरकार ने इन आरोपों को माकीहारा की व्यक्तिगत राय बताते हुए स्पष्ट किया कि यह जापान सरकार का आधिकारिक रुख नहीं है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि भारत और जापान के बीच परियोजना को लेकर सहयोग पहले की तरह जारी है और दोनों देशों के संबंध मजबूत हैं।

क्या है मुंबई-अहमदाबाद बुलेट ट्रेन परियोजना?

2015 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और तत्कालीन जापानी प्रधानमंत्री शिंजो आबे ने भारत की पहली हाई-स्पीड रेल परियोजना की आधारशिला रखी थी। लगभग 508 किलोमीटर लंबे इस कॉरिडोर पर बुलेट ट्रेन की अधिकतम गति 320 किमी प्रति घंटा होगी, जिससे मुंबई और अहमदाबाद के बीच की यात्रा लगभग दो से तीन घंटे में पूरी की जा सकेगी।

इस परियोजना की लगभग 80 प्रतिशत लागत जापान की एजेंसी JICA द्वारा मात्र 0.1 प्रतिशत ब्याज पर दिए गए 50 वर्ष के सॉफ्ट लोन से पूरी की जा रही है। इस ऋण की एक प्रमुख शर्त यह भी थी कि परियोजना में लगभग 30 प्रतिशत उपकरण जापानी कंपनियों से खरीदे जाएंगे।

आखिर क्यों हुई देरी?

शुरुआती योजना के अनुसार परियोजना 2023 तक पूरी हो जानी थी, जबकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2022 तक इसका एक हिस्सा शुरू करने की बात कही थी। लेकिन अब सरकार का लक्ष्य गुजरात खंड को 2027 तक और पूरी परियोजना को 2029 तक पूरा करने का है।

देरी के पीछे कई कारण सामने आए हैं—

– कोविड-19 महामारी के कारण निर्माण कार्य प्रभावित हुआ।
– महाराष्ट्र में भूमि अधिग्रहण को लेकर किसानों के विरोध और कानूनी विवादों ने परियोजना की गति धीमी कर दी।
– मैंग्रोव क्षेत्रों में पर्यावरणीय अनुमति और पेड़ों की कटाई को लेकर अदालतों में मामला चला।
– भूमि मुआवजे को लेकर गुजरात हाईकोर्ट में अभी भी कुछ मामले लंबित हैं।

इन सभी कारणों ने परियोजना की समयसीमा को लगातार आगे बढ़ाया।

क्या केवल भारत जिम्मेदार है?

परियोजना में देरी के लिए केवल भारत को जिम्मेदार ठहराना पूरी तस्वीर नहीं दिखाता।

रिपोर्टों के अनुसार, मुंबई के पास बनने वाले 21 किलोमीटर लंबे भूमिगत सेक्शन के टेंडर में कई जापानी कंपनियों ने रुचि नहीं दिखाई। वहीं जिन परियोजनाओं में जापानी कंपनियों ने बोली लगाई, उनकी लागत भारतीय अनुमान से काफी अधिक बताई गई। भारत ने इन बढ़ी हुई लागतों को स्वीकार करने से इनकार कर दिया।

यहीं से दोनों देशों के बीच तकनीकी और व्यावसायिक मतभेद सामने आने लगे।

सिग्नलिंग सिस्टम पर बढ़ा विवाद

जापान का मानना है कि शिंकानसेन केवल ट्रेन नहीं बल्कि एक संपूर्ण तकनीकी प्रणाली है, जिसमें ट्रेन, ट्रैक और सिग्नलिंग एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। इसलिए इनका अलग-अलग चयन नहीं किया जा सकता।

इसके विपरीत भारत का कहना है कि ऋण समझौते के तहत जापानी उपकरण खरीदने की शर्त जरूर है, लेकिन पूरे सिस्टम को केवल जापानी कंपनियों से लेना अनिवार्य नहीं है। इसी सोच के तहत भारत ने सिग्नलिंग सिस्टम का ठेका जर्मन कंपनी Siemens के नेतृत्व वाले कंसोर्टियम को दिया।

यही फैसला जापान के कुछ राजनीतिक नेताओं की नाराजगी की एक बड़ी वजह माना जा रहा है।

ट्रेनों को लेकर भी मतभेद

जापान चाहता है कि परियोजना में उसकी कावासाकी और हिताची कंपनियों की शिंकानसेन ट्रेनें ही इस्तेमाल हों। दूसरी ओर भारत प्रतिस्पर्धी बोली प्रक्रिया और लागत को प्राथमिकता दे रहा है।

इसके अलावा जापान की नई E10 श्रृंखला की हाई-स्पीड ट्रेनें अभी स्वयं जापान में परीक्षण चरण में हैं। इसी वजह से भारत ने समानांतर रूप से स्वदेशी हाई-स्पीड ट्रेन विकसित करने की दिशा में भी कदम बढ़ाया है। इसके लिए बीईएमएल को 280 किमी प्रति घंटे की परीक्षण गति वाली ट्रेन विकसित करने का अनुबंध दिया गया है।

हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि यदि शुरुआती वर्षों में स्वदेशी ट्रेनें केवल 250 किमी प्रति घंटे की व्यावसायिक गति से चलती हैं, तो परियोजना अपनी मूल क्षमता का पूरा लाभ नहीं दे पाएगी।

भारत सरकार का जवाब

विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि पूर्व जापानी मंत्री का सोशल मीडिया पोस्ट उनकी निजी राय है और उसे जापान सरकार का आधिकारिक दृष्टिकोण नहीं माना जाना चाहिए।

सरकार का कहना है कि परियोजना पर काम लगातार जारी है और अगले वर्ष गुजरात में इसका पहला खंड परिचालन के लिए तैयार होने की संभावना है।

निष्कर्ष

मुंबई-अहमदाबाद बुलेट ट्रेन परियोजना में देरी केवल किसी एक पक्ष की वजह से नहीं हुई। एक ओर भारत में भूमि अधिग्रहण, पर्यावरणीय मंजूरियां और महामारी जैसी चुनौतियां रहीं, वहीं दूसरी ओर लागत, तकनीकी नियंत्रण, सिग्नलिंग सिस्टम, ट्रेनों की आपूर्ति और व्यावसायिक शर्तों को लेकर भारत और जापान के बीच मतभेद भी सामने आए।

ऐसे में यह कहना कि परियोजना केवल भारत की वजह से अटकी है, उपलब्ध तथ्यों के आधार पर पूरी तरह सही नहीं कहा जा सकता। यह परियोजना दोनों देशों की तकनीकी, आर्थिक और प्रशासनिक चुनौतियों का संयुक्त परिणाम रही है। अब सबकी निगाहें इस बात पर हैं कि क्या 2027 में गुजरात खंड पर बुलेट ट्रेन वास्तव में दौड़ना शुरू करेगी और क्या यह भारत के रेल परिवहन में नई क्रांति का मार्ग प्रशस्त करेगी।

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