भारत में मानसून केवल एक मौसम नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की आजीविका, कृषि और अर्थव्यवस्था की जीवनरेखा है। ऐसे में जब जून के मध्य में ही मौसम विभाग के आंकड़े सामान्य से काफी कम बारिश का संकेत देने लगें, तो चिंता होना स्वाभाविक है।
हाल ही में भारतीय मौसम विभाग (आईएमडी) द्वारा जारी उपग्रह तस्वीरों और वर्षा आंकड़ों ने इसी चिंता को जन्म दिया है। आमतौर पर जून के दूसरे सप्ताह तक देश के बड़े हिस्से में मानसूनी बादलों की सक्रियता दिखाई देने लगती है, लेकिन इस बार तस्वीर कुछ अलग नजर आई। कई क्षेत्रों में बादलों की मौजूदगी अपेक्षाकृत कम दिखाई दी और वर्षा का स्तर भी सामान्य से काफी नीचे दर्ज किया गया।
मानसून की रफ्तार क्यों हुई धीमी?
मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार इस स्थिति के पीछे सबसे बड़ा कारण ऊपरी वायुमंडल में सक्रिय “वेस्टर्ली जेट स्ट्रीम” हो सकती है। जेट स्ट्रीम अत्यंत तेज गति से बहने वाली वायु धाराएं होती हैं, जो पृथ्वी के मौसम तंत्र को प्रभावित करती हैं।
इस वर्ष वेस्टर्ली जेट स्ट्रीम सामान्य स्थिति से दक्षिण की ओर खिसक गई है। इसके कारण मानसून को मजबूती देने वाली पूर्वी हवाओं का प्रवाह बाधित हुआ है। परिणामस्वरूप मानसूनी परिसंचरण कमजोर पड़ा और बादलों के विकास तथा वर्षा की प्रक्रिया प्रभावित हुई।
विशेषज्ञ इस स्थिति को “मानसून पॉज” या मानसून के अस्थायी ठहराव के रूप में देख रहे हैं। उनका मानना है कि यह स्थायी स्थिति नहीं है और आने वाले दिनों में मानसून दोबारा सक्रिय हो सकता है।
क्या अल नीनो भी जिम्मेदार है?
मानसून की कमजोरी के पीछे एक अन्य संभावित कारण अल नीनो प्रभाव भी माना जा रहा है।
अल नीनो प्रशांत महासागर में होने वाली एक प्राकृतिक जलवायु घटना है, जिसमें समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से अधिक बढ़ जाता है। इसका असर वैश्विक मौसम प्रणाली पर पड़ता है और कई क्षेत्रों में वर्षा के पैटर्न बदल जाते हैं।
भारत में सामान्यतः मानसून को मजबूत बनाने वाली व्यापारिक हवाएं अल नीनो के दौरान कमजोर पड़ जाती हैं। इससे मानसूनी गतिविधियां प्रभावित हो सकती हैं और वर्षा में कमी देखने को मिल सकती है।
भारतीय मानसून आखिर काम कैसे करता है?
मानसून का अर्थ है मौसम के अनुसार हवाओं की दिशा में परिवर्तन। भारत में मुख्य रूप से जून से सितंबर तक दक्षिण-पश्चिम मानसून सक्रिय रहता है।
गर्मियों के दौरान भारतीय भूभाग तेजी से गर्म हो जाता है, जबकि समुद्र अपेक्षाकृत ठंडा रहता है। इससे भूमि पर निम्न दबाव क्षेत्र बनता है। इस निम्न दबाव को भरने के लिए अरब सागर और बंगाल की खाड़ी से नमी से भरी हवाएं भारत की ओर बढ़ती हैं।
जब ये हवाएं पहाड़ों, विशेषकर हिमालय और पश्चिमी घाटों से टकराती हैं, तो ऊपर उठकर ठंडी होती हैं। ठंडा होने पर इनमें मौजूद जलवाष्प संघनित होकर बादलों का निर्माण करती है और अंततः वर्षा होती है।
मानसून की दो प्रमुख शाखाएं होती हैं—
अरब सागर शाखा, जो केरल, कर्नाटक, गोवा, महाराष्ट्र और पश्चिमी तटीय क्षेत्रों में वर्षा कराती है।
बंगाल की खाड़ी शाखा, जो पूर्वोत्तर भारत, पश्चिम बंगाल, बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश और उत्तर भारत के अन्य हिस्सों में वर्षा पहुंचाती है।
इस पूरी प्रक्रिया में हिमालय की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है, क्योंकि वह नमी से भरी हवाओं को उत्तर की ओर निकलने से रोककर भारतीय मैदानों में वर्षा के लिए मजबूर करता है।
खेती और अर्थव्यवस्था पर क्या असर पड़ सकता है?
जून का महीना खरीफ फसलों की बुवाई के लिए सबसे महत्वपूर्ण समय माना जाता है। धान, सोयाबीन, मक्का, कपास और दालों जैसी फसलों की खेती काफी हद तक मानसूनी वर्षा पर निर्भर करती है।
यदि बारिश में कमी लंबे समय तक बनी रहती है, तो किसानों को बुवाई टालनी पड़ सकती है। वहीं जिन क्षेत्रों में शुरुआती बारिश के बाद बुवाई हो चुकी है, वहां पर्याप्त नमी न मिलने पर फसलों को नुकसान पहुंच सकता है।
कृषि उत्पादन में गिरावट का सीधा असर खाद्य पदार्थों की कीमतों पर पड़ता है। इसलिए कमजोर मानसून केवल किसानों की समस्या नहीं है, बल्कि यह आम उपभोक्ता और देश की अर्थव्यवस्था के लिए भी चिंता का विषय बन सकता है।
क्या सूखे का खतरा है?
फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि देश सूखे की ओर बढ़ रहा है। मौसम विशेषज्ञों का मानना है कि वर्तमान स्थिति एक अस्थायी व्यवधान हो सकती है और मानसून आने वाले दिनों में फिर से सक्रिय हो सकता है।
हालांकि मौसम विज्ञान में कोई भी पूर्वानुमान पूर्णतः निश्चित नहीं होता। यदि मानसून की गति जल्द नहीं सुधरती, तो कृषि, जल संसाधनों और खाद्य सुरक्षा पर व्यापक प्रभाव पड़ सकता है।
उम्मीद बारिश की
भारत की कृषि, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और करोड़ों लोगों का जीवन मानसून पर निर्भर करता है। इसलिए देश की नजरें अब आसमान पर टिकी हैं।
उम्मीद यही है कि वेस्टर्ली जेट स्ट्रीम का प्रभाव कमजोर पड़े, मानसून फिर से सक्रिय हो और देशभर में अच्छी बारिश हो। क्योंकि मजबूत मानसून केवल खेतों के लिए ही नहीं, बल्कि पूरे देश की आर्थिक और सामाजिक स्थिरता के लिए आवश्यक है।












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