मुंबई। सिने एंड टीवी आर्टिस्ट्स एसोसिएशन (CINTAA) में दो गुटों में बंटवारे के बाद हुए चुनाव ने संगठन के भीतर विवाद को और गहरा कर दिया है। एक गुट के चुनाव में उपासना सिंह, कुनिका सदानंद और कई अन्य कलाकारों के जीतने की खबरों के बीच अब पूर्व पदाधिकारियों और नई कमेटी के बीच आरोप-प्रत्यारोप तेज हो गए हैं।
नई कमेटी के सदस्यों ने चुनाव जीतने के बाद अपना विजन साझा करते हुए संगठन के पिछले संचालन में कथित वित्तीय अनियमितताओं और निजी लाभ के लिए फंड के इस्तेमाल जैसे गंभीर आरोप लगाए। इन आरोपों के बाद पद्मिनी कोल्हापुरे और पूनम ढिल्लों ने सामने आकर अपनी प्रतिक्रिया दी है। दोनों ने न केवल चुनाव और नई कमेटी की वैधता पर सवाल उठाए, बल्कि संगठन के बैंक खातों के फ्रीज होने और कर्मचारियों के वेतन से जुड़े मुद्दे भी उठाए।
बैंक खाते फ्रीज होने से कल्याणकारी कार्य प्रभावित होने का दावा
पद्मिनी कोल्हापुरे और पूनम ढिल्लों के अनुसार, विवाद की शुरुआत 7 तारीख को हुई, जब उपासना सिंह और दीपक पराशर ने कथित तौर पर बैंकों में जाकर कागजों पर हस्ताक्षर किए और सिंटा के बैंक खातों को फ्रीज करवा दिया।
पद्मिनी ने आरोप लगाया कि संबंधित लोगों को ऐसा करने का अधिकार नहीं था। उन्होंने कहा कि खाते अब तक फ्रीज हैं, जिसके कारण संगठन न तो अपने कल्याणकारी कार्य कर पा रहा है और न ही जरूरतमंद कलाकारों की सहायता कर पा रहा है।
उन्होंने कर्मचारियों के वेतन का मुद्दा उठाते हुए कहा कि विवाद के बीच स्टाफ को परेशान नहीं किया जाना चाहिए। उनके मुताबिक, यदि फंड जारी नहीं होंगे तो कर्मचारियों को वेतन देना मुश्किल हो जाएगा।
पदाधिकारियों को केवल औपचारिक भूमिका का भरोसा देने का आरोप
पूनम ढिल्लों ने दावा किया कि उन्हें और पद्मिनी को संगठन में लाने के दौरान कहा गया था कि उन्हें केवल साल में तीन बार कार्यालय आकर बैठकों में हिस्सा लेना होगा और बाकी काम अन्य लोग संभालेंगे।
उन्होंने बताया कि मनोज जोशी और प्रीति सपू उन्हें इस भरोसे के साथ लेकर आए थे कि उनकी भूमिका सीमित होगी। लेकिन बाद में उन्हें अपेक्षा से कहीं अधिक बार सिंटा कार्यालय आना पड़ा।
पूनम ने कहा कि दोनों कलाकारों ने संगठन के कामकाज में सक्रिय रूप से भाग लिया और कई बैठकों में हिस्सा लिया। उनके मुताबिक, यही स्थिति विवाद का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन गई है।
उपासना सिंह के पद और चुनाव लड़ने की वैधता पर सवाल
पद्मिनी कोल्हापुरे ने उपासना सिंह के नए चुनाव में भाग लेने की पात्रता पर भी सवाल उठाए। उन्होंने दावा किया कि उपासना सिंह पिछली कमेटी में जनरल सेक्रेटरी थीं और उन्होंने अब तक उस पद से औपचारिक इस्तीफा नहीं दिया है।
उनका कहना था कि यदि पिछली कमेटी और वर्तमान चुनाव के बीच संगठनात्मक और संवैधानिक प्रक्रियाएं पूरी नहीं हुई हैं, तो नए चुनाव की वैधता पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है।
उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि नई कमेटी और फेडरेशन से जुड़े चुनाव संगठन के संविधान के अनुरूप नहीं कराए जा रहे हैं। हालांकि, इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि और संबंधित संवैधानिक दस्तावेजों की समीक्षा आवश्यक है।
पुलिस और अदालत तक पहुंचा विवाद
पद्मिनी और पूनम ने कहा कि उन्होंने अपने जीवन में पहली बार अदालत, पुलिस स्टेशन और वकीलों से जुड़े मामलों का सामना किया है। उनके अनुसार, सिंटा का विवाद अब केवल संगठनात्मक मतभेद तक सीमित नहीं रहा, बल्कि कानूनी स्तर तक पहुंच चुका है।
पद्मिनी ने एक घटना का जिक्र करते हुए कहा कि पुलिस के आने पर उन्होंने अधिकारियों से संबंधित आदेश दिखाने और विवाद की वास्तविक स्थिति स्पष्ट करने को कहा। बातचीत में उन्होंने यह सवाल भी उठाया कि कमेटी को भंग करने का अधिकार किसके पास है और क्या इसके लिए कोई आधिकारिक आदेश जारी हुआ था।
आगे क्या होगा?
सिंटा के भीतर चल रहे इस विवाद में एक ओर नई कमेटी के सदस्यों की ओर से पिछली व्यवस्था पर गंभीर आरोप लगाए जा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर पद्मिनी कोल्हापुरे और पूनम ढिल्लों चुनाव की प्रक्रिया, बैंक खातों और संगठनात्मक अधिकारों को लेकर सवाल उठा रही हैं।
मामले की वास्तविक स्थिति स्पष्ट करने के लिए चुनाव संबंधी दस्तावेज, संगठन का संविधान, बैंक खातों को फ्रीज किए जाने के आदेश और दोनों पक्षों के आधिकारिक बयान महत्वपूर्ण होंगे। जब तक इन आरोपों की स्वतंत्र जांच या सक्षम प्राधिकारी का निर्णय सामने नहीं आता, तब तक किसी भी पक्ष के दावों को अंतिम सत्य मानना उचित नहीं होगा।
फिलहाल, सिंटा का विवाद कलाकारों के संगठनात्मक अधिकारों, वित्तीय पारदर्शिता और नेतृत्व की वैधता से जुड़े कई गंभीर सवाल खड़े कर रहा है।












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