बारिश ने खोल दी ‘स्मार्ट’ भारत की पोल? आखिर क्यों हर साल डूब जाते हैं हमारे शहर

मुंबई में कुछ दिन पहले तक पीने के पानी का संकट था। शहर को पानी देने वाली झीलों का जलस्तर लगातार घट रहा था और जलापूर्ति में कटौती की नौबत आ गई थी। लेकिन कुछ ही दिनों बाद वही मुंबई मूसलाधार बारिश के बाद पानी में डूब गई। सड़कें नदियों में बदल गईं, लोकल ट्रेनें प्रभावित हुईं, उड़ानों पर असर पड़ा और लोगों को घरों में रहने की सलाह देनी पड़ी।

यह विरोधाभास केवल मुंबई तक सीमित नहीं है। चेन्नई, बेंगलुरु, गुरुग्राम, दिल्ली, हैदराबाद—लगभग हर आधुनिक भारतीय महानगर पहली ही तेज बारिश में जलभराव, ट्रैफिक जाम और अव्यवस्था का सामना करता दिखाई देता है। सवाल यह है कि आखिर सैकड़ों-हजारों करोड़ रुपये खर्च करने के बावजूद हमारे शहर हर साल मानसून के सामने बेबस क्यों नजर आते हैं?

विडंबना यह है कि यह उसी देश की तस्वीर है जिसने लगभग 5000 वर्ष पहले मोहनजोदड़ो और हड़प्पा जैसे सुव्यवस्थित नगर बसाए थे। सिंधु घाटी सभ्यता की खुदाई में मिली जल निकासी व्यवस्था आज भी दुनिया के नगर नियोजकों को हैरान करती है। उस दौर में घर-घर से जुड़ी पक्की नालियां, वर्षा जल निकासी और सुव्यवस्थित शहरी योजना मौजूद थी। लेकिन 21वीं सदी का भारत, आधुनिक तकनीक और विशाल बजट होने के बावजूद, बुनियादी शहरी प्रबंधन की परीक्षा में बार-बार असफल होता दिखाई देता है।

भारत दुनिया की सबसे तेज़ी से शहरीकरण करने वाली अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। आने वाले वर्षों में करोड़ों लोग गांवों से शहरों की ओर आएंगे। उन्हें केवल ऊंची इमारतें नहीं, बल्कि मजबूत सड़कें, सुरक्षित ड्रेनेज सिस्टम, स्वच्छ पानी, सार्वजनिक परिवहन और रहने योग्य शहर चाहिए होंगे।

इसी सोच के साथ 2015 में केंद्र सरकार ने स्मार्ट सिटीज मिशन शुरू किया। लगभग 100 शहरों को आधुनिक सुविधाओं से लैस करने का लक्ष्य रखा गया। डिजिटल गवर्नेंस, इंटीग्रेटेड कमांड एंड कंट्रोल सेंटर, बेहतर सड़कें, जलापूर्ति, सार्वजनिक परिवहन और आधुनिक शहरी सुविधाओं का वादा किया गया। कई शहरों में परियोजनाएं पूरी भी हुईं और कोविड-19 महामारी के दौरान कई कंट्रोल सेंटर उपयोगी भी साबित हुए।

लेकिन सवाल यह है कि क्या भारतीय शहर वास्तव में रहने के लिहाज से बेहतर बने?

कई स्वतंत्र अध्ययनों ने इस मिशन की एक बड़ी कमजोरी की ओर संकेत किया। अधिकांश निवेश शहरों के केवल छोटे-से हिस्से पर केंद्रित रहा। यदि किसी 20 लाख आबादी वाले शहर में विकास का बड़ा हिस्सा केवल 2 लाख लोगों वाले इलाके तक सीमित रह जाए, तो बाकी नागरिकों के जीवन में कितना बदलाव आएगा? यही सबसे बड़ा प्रश्न है।

तकनीक और सौंदर्यीकरण पर खर्च बढ़ा, लेकिन नालियां, फुटपाथ, सार्वजनिक परिवहन और जल निकासी जैसी मूलभूत आवश्यकताएं कई स्थानों पर पीछे छूट गईं। डिजिटल स्क्रीन, स्मार्ट पोल और निगरानी कैमरे किसी शहर को आधुनिक तो दिखा सकते हैं, लेकिन यदि पहली बारिश में सड़कें तालाब बन जाएं तो ‘स्मार्ट सिटी’ का दावा खोखला महसूस होने लगता है।

परिवहन क्षेत्र की तस्वीर भी कुछ ऐसी ही है। कई रिपोर्टों के अनुसार, सड़कों और पार्किंग पर भारी निवेश हुआ, जबकि सार्वजनिक बस सेवाओं पर अपेक्षाकृत बहुत कम खर्च किया गया। जबकि भारत के अधिकांश शहरों में रोज़ाना करोड़ों लोग बसों पर निर्भर रहते हैं।

शहर की असली परीक्षा किसी उद्घाटन समारोह में नहीं होती, बल्कि पहली तेज बारिश में होती है। यदि दो घंटे की बारिश के बाद पानी दिनों तक सड़कों पर जमा रहे, तो यह केवल प्राकृतिक आपदा नहीं बल्कि शहरी नियोजन की कमजोरी भी दर्शाता है।

मुंबई इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। इस वर्ष मानसून ने न केवल शहर की व्यवस्थाओं को चुनौती दी, बल्कि मुंबई-पुणे एक्सप्रेसवे के बहुचर्चित मिसिंग लिंक प्रोजेक्ट पर भी सवाल खड़े कर दिए। लगभग 6700 करोड़ रुपये की लागत से बने इस महत्वाकांक्षी मार्ग को उद्घाटन के कुछ ही सप्ताह बाद भूस्खलन का सामना करना पड़ा। रिटेनिंग वॉल को नुकसान पहुंचा और ट्रैफिक को पुराने घाट मार्ग पर मोड़ना पड़ा।

स्वाभाविक है कि पहाड़ी क्षेत्रों में भूस्खलन पूरी तरह रोका नहीं जा सकता। लेकिन यदि किसी परियोजना को हर मौसम के लिए तैयार बताया गया हो, तो उसके ड्रेनेज, ढलान सुरक्षा और जोखिम प्रबंधन पर सवाल उठना भी स्वाभाविक है।

उत्तर प्रदेश के गंगा एक्सप्रेसवे, दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे और अन्य परियोजनाओं में भी पहली बारिश के बाद कटाव और धंसाव जैसी घटनाएं सामने आईं। निर्माण एजेंसियां इन्हें शुरुआती तकनीकी समस्याएं बताती हैं, लेकिन जनता यह पूछने का अधिकार रखती है कि क्या गुणवत्ता का पैमाना केवल उद्घाटन है या परियोजना की वास्तविक आयु?

रेलवे की स्थिति भी इससे अलग नहीं दिखती। कई प्रमुख रेलवे स्टेशनों पर बारिश के दौरान प्लेटफॉर्म की छतों से पानी टपकने, अंडरपास में जलभराव और यात्रियों को भारी असुविधा का सामना करना पड़ा।

समस्या केवल निर्माण की नहीं, बल्कि रखरखाव और दीर्घकालिक योजना की भी है।

दूसरी ओर, दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेसवे जैसी विशाल परियोजनाएं भूमि अधिग्रहण, ठेकेदारी विवाद और निर्माण में देरी जैसी चुनौतियों से जूझ रही हैं। परिणाम यह है कि लागत बढ़ती है, समय बढ़ता है और विकास की गति धीमी पड़ जाती है।

इसी तरह मध्य प्रदेश के इंदौर में स्वीकृत 100 बेड के सरकारी अस्पताल का मामला बताता है कि कई बार योजनाएं कागज़ों पर आगे बढ़ जाती हैं, लेकिन ज़मीन पर उनका अस्तित्व ही नहीं बन पाता। डॉक्टरों और कर्मचारियों की नियुक्ति हो जाती है, लेकिन अस्पताल की इमारत तक नहीं बनती।

इन सभी घटनाओं की परिस्थितियां अलग-अलग हो सकती हैं, लेकिन उनसे उठने वाले प्रश्न एक जैसे हैं।

क्या हम निर्माण से अधिक रखरखाव पर ध्यान दे रहे हैं?
क्या जलवायु परिवर्तन और बदलते मौसम को ध्यान में रखकर इंफ्रास्ट्रक्चर डिज़ाइन किया जा रहा है?
क्या शहरी विकास का लाभ पूरे शहर को मिल रहा है या केवल कुछ चुनिंदा इलाकों को?

भारत निश्चित रूप से अभूतपूर्व स्तर पर सड़कें, एक्सप्रेसवे, मेट्रो, हवाई अड्डे और अन्य सार्वजनिक परियोजनाएं विकसित कर रहा है। यह सकारात्मक बदलाव है। लेकिन किसी भी इंफ्रास्ट्रक्चर की सफलता केवल उसके उद्घाटन से नहीं, बल्कि वर्षों तक सुरक्षित, टिकाऊ और प्रभावी ढंग से काम करने की क्षमता से तय होती है।

आज आवश्यकता केवल नए प्रोजेक्ट बनाने की नहीं, बल्कि बेहतर शहरी नियोजन, वैज्ञानिक ड्रेनेज सिस्टम, नियमित रखरखाव, पारदर्शी गुणवत्ता नियंत्रण और जवाबदेही की है।

क्योंकि अगर 5000 वर्ष पहले की सभ्यता पानी के साथ जीना सीख सकती थी, तो आधुनिक भारत के पास उससे बेहतर शहर बनाने की क्षमता अवश्य है। सवाल केवल संसाधनों का नहीं, बल्कि प्राथमिकताओं और इच्छाशक्ति का है।

आखिरकार, विकास का वास्तविक अर्थ चमकदार उद्घाटन नहीं, बल्कि ऐसा शहर है जहाँ पहली बारिश लोगों के लिए उत्सव बने, आपदा नहीं।

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