भारतीय कॉर्पोरेट जगत के दिग्गज उद्योगपति विजयपत सिंघानिया अब इस दुनिया में नहीं रहे। 29 मार्च 2026 को 87 वर्ष की उम्र में उनका निधन हो गया। उनके जाने के साथ ही न सिर्फ एक सफल उद्योगपति का युग समाप्त हुआ, बल्कि एक ऐसी कहानी भी पीछे छूट गई जो हर परिवार और हर कारोबारी के लिए गहरी सीख बन गई है।
छोटे कारोबार से वैश्विक ब्रांड तक का सफर
विजयपत सिंघानिया ने Raymond Limited को एक साधारण टेक्सटाइल मिल से उठाकर एक ग्लोबल ब्रांड बना दिया। “द कम्प्लीट मैन” जैसी पहचान के साथ रेमंड ने भारतीय फैशन और टेक्सटाइल इंडस्ट्री में एक नई छवि बनाई। उनकी अगुवाई में कंपनी ने कपड़ों से आगे बढ़कर इंजीनियरिंग और रियल एस्टेट जैसे क्षेत्रों में भी विस्तार किया।
मुंबई के मालाबार हिल पर बना उनका आलीशान निवास JK House कभी देश की सबसे ऊंची निजी इमारतों में गिना जाता था, जिसकी तुलना Antilia से की जाती थी।
एक फैसले ने बदल दी पूरी जिंदगी
साल 2015 में विजयपत सिंघानिया ने अपने बेटे गौतम सिंघानिया पर भरोसा करते हुए रेमंड में अपनी बड़ी हिस्सेदारी ट्रांसफर कर दी। उस समय इसकी कीमत हजारों करोड़ रुपये थी। लेकिन यही फैसला उनके जीवन का सबसे बड़ा मोड़ साबित हुआ।
हिस्सेदारी सौंपने के बाद पिता-पुत्र के रिश्तों में खटास बढ़ी और हालात इतने बिगड़े कि विजयपत सिंघानिया को अपने ही घर से अलग होना पड़ा। मीडिया रिपोर्ट्स और उनके खुद के बयानों के अनुसार, उन्हें बुनियादी सुविधाओं तक के लिए संघर्ष करना पड़ा और उन्होंने अपने जीवन के अंतिम वर्ष किराए के मकान में बिताए।
शिखर से संघर्ष तक
एक समय 12,000 करोड़ रुपये से अधिक की संपत्ति के मालिक रहे विजयपत सिंघानिया के लिए यह बदलाव बेहद पीड़ादायक था। जिस व्यक्ति ने विश्व रिकॉर्ड बनाते हुए हॉट एयर बैलून से ऊंची उड़ान भरी, वही अपने अंतिम समय में साधारण जीवन जीने को मजबूर हो गया।
उनकी जिंदगी का यह पहलू सोशल मीडिया और सार्वजनिक चर्चा का विषय भी बना, जिसने रिश्तों, भरोसे और संपत्ति के प्रबंधन पर गंभीर सवाल खड़े किए।
एक युग का अंत, एक सीख की शुरुआत
विजयपत सिंघानिया की कहानी सिर्फ सफलता की नहीं, बल्कि विश्वास और फैसलों की भी कहानी है। उन्होंने दुनिया को यह दिखाया कि कैसे मेहनत से साम्राज्य खड़ा किया जा सकता है, लेकिन साथ ही यह भी सिखाया कि जीवन के अंतिम फैसले कितने निर्णायक हो सकते हैं।
उनका जीवन एक कड़वी सच्चाई छोड़ गया है—
संपत्ति से ज्यादा जरूरी है सही समय पर सही निर्णय और रिश्तों में संतुलन।
आज जब कॉर्पोरेट जगत उन्हें याद कर रहा है, उनकी कहानी हर उस व्यक्ति के लिए एक चेतावनी है जो बिना सोचे-समझे अपनी पूरी विरासत सौंप देता है।
द पिता-पुत्र के रिश्तों में खटास बढ़ी और हालात इतने बिगड़े कि विजयपत सिंघानिया को अपने ही घर से अलग होना पड़ा। मीडिया रिपोर्ट्स और उनके खुद के बयानों के अनुसार, उन्हें बुनियादी सुविधाओं तक के लिए संघर्ष करना पड़ा और उन्होंने अपने जीवन के अंतिम वर्ष किराए के मकान में बिताए।



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